नासिरा शर्मा को सुनते हुए ....................
जन संस्कृति मंच अक्सर तमाम मतभेदोँ ,बहस मुबाहिसोँ के बाद भी हमेँ एक बेहतर मानसिक खुराक देने का आयोजन कर ही देता है . 17/9/18 ऐसा ही एक मौका था जब हम उर्दू अदब मेँ बायीँ पसली यानि उर्दू साहित्य मेँ औरत पर चर्चा करने के लिये लखनऊ के निशात गंज स्थित कैफी आज़मी सभागार मेँ इकट्ठे हुए थे. यहाँ जुटना इस बात की सूचना थी कि अब सभी समाजोँ मेँ औरत सामूहिक रूप से अपने मुद्दोँ पर जुटकर सोच रही है और बता रही है कि बहुतेरी चुप्पियाँ या तो टूट चुकी हैँ या फिर वो तोडने की मुहिम मेँ है. यह भी कि वह अपनी चौखटोँ के पार भी दुनिया देख और समझ रही है
......लेकिन इस सेमिनार की मुख्य अतिथि ने अपने उद्बोधन मेँ स्त्री के सन्द्र्भोँ को जिस तरह रेखांकित किया वह हतप्रभ करने वाली बात थी . सच कहूँ तो उनकी बातोँ ने स्त्री , उसकी पहचान, उसके व्यक्ति होने की लडाई की इतने सालोँ की कवायद को कई मायनोँ मेँ सीधे सीधे कटघडे मेँ खडा कर दिया. मुझे उनकी बातोँ ने पूरी तरह कई स्तरोँ पर निराश किया. यह निराशा सिर्फ मुझे हुई या फिर औरोँ को भी ये मुझे पता नहीँ पर औरतोँ के साथ काम करते हुए जितना भी मैने सीखा समझा और जाना है उसमेँ नासिरा जी की बहुतेरी बातेँ फिट नहीँ बैठती या कहूँ कि कोई भी बात न तो जँचती है न गले से उतरती है. मै समझ नहीँ पा रही कि उम्र के इस पडाव पर आकर नासिरा शर्मा इस तरह एक स्त्री के रूप मेँ अपनी हार व्यक्त कर रही थीँ , विवशता व्यक्त कर रहीँ थीँ या फिर उनके तजुर्बोँ ने उन्हेँ य्ह बताया कि स्त्री जैसी है उसे उससे निकलने की जरूरत नहीँ? या फिर बात भारत जैसे देश मेँ अल्प्संख्यक समाज की स्त्री को रेखांकित कर गयी ??? बहर हाल, उनकी बात का जो भी मतलब रहा हो लेकिन नयी स्त्री, नये स्त्री विमर्श और नयी चेतना वाली जेनेरेशन की व्याख्याओँ मेँ उनकी बात आलोचनाओँ के घेरे मेँ अधिक और ग्रहणीय कम ही लगती रही . क्योँकि वह बार बार नयी स्त्री , उसके लेखन , उसके काम और स्त्री विमर्श की अगुआ स्त्रियोँ को कटघरे मेँ खडा करती रही थीँ.
मुझे लगता है नासिरा जी के वक्तव्योँ पर आने से पहले कुछ अपनी बातेँ भी रखती चलूँ ताकि भारत के अन्दर नयी स्त्री, उसका लेखन, उसके विचार को रेखांकित कर सकूँ . अपनी बात इसलिये भी कि उर्दू अदब , अल्प सँख्यक मुस्लिम समाज , उस समाज की स्त्री इन सब तक पहुँचना मेरे लिये एक समय तक टेढी खीर ही थी. स्वतंत्र भारत मेँ जन्मी मैँ ने बहुत बाद मेँ जाना कि भारत एक जटिल समाजोँ के सामुच्च्य से बना देश है. बहुत बाद मेँ ही मुझे यह भी पता चला कि इन जटिल समाजोँ के बीच एक बडी मानसिक दूरी भी है. इसलिये जब हम भारत मेँ स्त्रियोँ, उनकी स्वतंत्रता , की बात करते हैँ तो वो समाज, उसके नियम कानून और उन समाजोँ की विशेषता और धर्म अनायास ही इस पूरी बात चीत का हिस्सा ब्नन जाते हैँ . नासिरा जी की बातोँ मेँ मुझे धर्म और राजनीति दोनोँ के प्रभाव और दबाव दोनोँ साफ साफ नज़र आ रहा था. उनकी बातोँ मेँ मुझे अल्प्संख्यक समाज का गुस्सा, तेवर और अपनी अलग पह्चान बनाये रखने की जिद भी दीखी.
तमाम विश्लेषनोँ के बावजूद यह भी सच है कि अपने समाज, अपने समूह, वर्ग अपने इलाके मेँ, धर्म –जाति और अपने साहित्य मेँ औरत पर चर्चा करना दुनिया का सबसे पेचीदा और दुरूह काम है और जोखिम भरा भी. ऐसा इसलिये है क्योंकि औरत लम्बे समय से एक ऐसे जीवन की आदी रही है जिसमेँ उसके स्वतंत्र होने की चेतना कहीँ गुम थी. वह आमतौर पर एक बेहतर श्रमिक थी और आर्थिक रूप से पराश्रित भी और अब वह जब इसे तोडने की कवायद मेँ जुटी है तो अक्सर लोगोँ के सामने उसे और उसकी परिस्थितियोँ के बेहतर और सटीक रेखांकन का संकट खडा हो जाता है . पित्रिसत्तात्मक ढांचे मेँ पले बढे हम जाने अनजाने कई बारीक बातोँ को या तो समझ नहीँ पाते या फिर समझते हुए भी उसको रेखांकित नहीँ कर पाते. अब जबकि स्त्री पढ रही है ताकि वह अपने इंसान होने के अर्थ को न केवल जान सके बल्कि अपने अनुभवोँ के माध्यम से अप्नी परिस्थितियोँ का आंकलन कर सके . वह लिख रही है ताकि वह समाज मेँ अपनी स्थिति उसकी जटिलता को लोगोँ के सामने रख सके , लोगोँ को बता सके. वह अब बोल भी रही है ताकि वह अपनी सोच और वास्तविक स्थिति वह इन का सही खाका खाका खीँच सके.किंतु फिर भी उसके इर्द गिर्द कई संकट हैँ. वह इजन संकटोँ से जूझ रही है, ....इसी लिये जब मैँ जोखिम भरा कहती हूँ तो मेरे सामने स्त्री, उसके जीवन, उसकी खामोशी, उसकी आवाज़, उसके संघर्ष और उसके प्रतिकार के बहुत से चित्र उभर आते हैँ जो धर्म , समाज, जाति और समूह द्वारा कभी प्रतिबन्धित कभी बाधित तो कभी पूरी तरह नजरअन्दाज किये जाते रहे हैँ. लम्बे समय तक स्त्री ने या तो सवाल किये ही नहीँ और अगर किये भी तो उसे चुप करा दिया गया. इसलिये जब कलमकार जब उसके पक्ष को लेकर सामने आता है, उसकी बात लिखता है तो वह कई अर्थोँ मेँ महत्वपूर्ण हो जाता है.
. ... और जब मैँ चर्चा के इस सिलसिले मेँ दुरूह और पेचीदा शब्द का प्रयोग करती और कहती हूँ तो मुझे स्त्री और स्त्रीवादी दोनोँ की मुश्किलेँ भारत जैसे बहु जातिय , बहु वर्गीय और बहु धर्मीय समाज वाले देश मेँ साफ साफ नजर आती है. .....जब् यह चर्चा उस अल्प संख्यक कहे जाने वाले वर्ग के हवाले से हो तब तो यह पेचीदगियाँ संकरे सामाजिक राजनीति हलकोँ से गुजरते हुए कई और भी कठिनाइयाँ पैदा करती हैँ. दरअसल स्त्री पर चर्चा उस पूरी सामाजिक संरचना पर चर्चा है जिसमेँ स्त्री येन केन प्रकारेण जीती आयी है .........और किसी भी देश मेँ अल्प संख्यक समाज की स्त्री , उसके अधिकार पर चर्चा उस देश की सत्ता , सामाजिक आर्थिक सरोकारोँ और कई तरह की जटिल स्थितियोँ पर चर्चा बन जाती है. मुझे लगता है कम से कम भारत के सन्दर्भ मेँ बहुत कुछ ऐसा ही है.
मैँ यह बात अनायास नहीँ कर रही बल्कि इस सेमिनार की मुख्य अतिथि और अदब मेँ बाईँ पसली जैसे संकलन को लेकर आने वाली एक बडी लेखिका नासिरा शर्मा को सुनते हुए इस बात का आभास मुझे साफ साफ होता है. मुझे नासिरा जी के लेक्चर के कई पहलुओँ ने हतोत्साहित किया जिसमेँ स्त्री, उसके लेखन की आलोचना के साथ ..... नई राजनीति से उलझी उनकी टिप्पणियोँ ने जो सन्देश दिया वह अन्दर तक हिला देने के लिये काफी था.
सच कहूँ तो मैनेँ अपनी जेनेरेशन की अल्प संख्यक स्त्रियोँ की आवाज़ मेँ वह ताप सुनी थी जो मेरी आवाज़ से मेल खाती थी. मुझे उनमेँ वही छट्पटाहट दिखती थी जो कभी मेरे अन्दर भी उछाल मारती थी. उनकी हिम्मात अक्सर मुझे हौसला देती थी कि हम अकेले नहीँ .... सच ! मुझे मेरी वो तीन मुस्लिम दोस्त याद आ रही थीँ जो बात बात पर अपनी सामाजिक जकडन को , पढने के लिये अपनी जिद्दोजहद को बार बार बयान करती थीँ. वह अक्सर कहती थीँ कि ‘’ हमने कितनी चौखटेँ , खिडकियाँ और कितने ही दरवाजे तोडे हैँ यह दूसरे क्या जानेँ. अपनी जिद्दोजहद का बखान करते हुए कई बार बताती थीँ कि उनकी दिक्कतेँ क्या हैँ ,तब मुझे पता चला था कि वह भी उन्हीँ स्थितियोँ से लड रही हैँ जिससे हम सब गुजर रहे हैँ. उन्होँने ही मेरा परिचय उर्दू की कहानियोँ, उसमेँ महिलाओँ खासकर मुस्लिम महिलाओँ के किरदारोँ से कराया था. उन्होनेँ ही मुझे बहुतेरी लेखिकाओँ के नाम बताये थे और पात्रोँ के चरित्रो के रेखांकन की बात की थी. वर्ना मेरा नाता ऊर्दू अदब से दूर की दुआ सलाम जैसा ही रहा था.
लिपि न आने की दिक्कतोँ के कारण अक्सर उर्दू साहित्य तक पहुँचने का सहारा मेरे लिये अनुवाद ही रहा है. मुझे याद है पहली बार उर्दू साहित्य को छुआ तो इस्मत चुगताई की आत्मकथा “ कागजी है पैराहन ‘’ पढी ....और लगा कि इस साहित्य की महिला कलमकारोँ मेँ कुछ बात है ....कागजी है पैराहन पढ्ते हुए बार बार दिल ने कहा - क्या लिखती है ये महिला ! फिर तो खोज खोज कर वो सारे अनुवाद पढ डाले जो इस्मत चुगताई ने लिखे थे. मुझे हमेशा लगा कि मेरी जिन बातोँ का जवाब मेरे घर की औरतेँ नहीँ दे पातीँ वह इस्मत देती हैँ और बस मैँ उनकी मुरीद बनती चली गयी ........... फिर एक दिन कुर्तुलैन हैदर का एक कहानी संग्रह हाथ लग गया “ अगले जनम मोहे बिटिया न कीज़ो’’ के नाम से और फिर उनको भी पढ डाला और यह सिलसिला चलता रहा ..........फिर एक लगाम लग गयी क्योंकि भाषा आडे आ गयी .......इस बीच जिसे पढा वो थीँ नासिरा शर्मा जो हिन्दी और उर्दू दोनोँ मेँ समान रूप से सम्मानित रहीँ.... जिनकी ‘ठीकरे की मंगनी’ ने मुझे अपना दिवाना बना दिया था फिर शल्मली फिर बहुत कुछ ......और अंत मेँ तस्लीमा को खूब पढा. इस तरह उर्दू अदब की बायीँ पसलियोँ ने ही मुझे बताया कि बायीँ पसली ही असली ताकत है, उसकी कलम मेँ दम है, वह अपनी बात बेबाकी से रखना जानती है. वह एक इंसान है इस मुहिम की आवाज़ है.
.......और तसलीमा ने तो सबको पीछे छोड बहुत कुछ कह डाला . तस्लीमा एक स्वतंत्र चेता स्त्री है उसका लेखन अक्सर हमेँ बताता है कि किसी भी समाज की स्त्री समाज का स्वत्ंत्र हिस्सा है ही नहीँ . वह अलग अलग समाजोँ मेँ अलग अलग पहचान लिये उस खूँटे का वह सिरा है जिसे आवश्यक रूप से बान्धे रखने की कवायद हमेशा से की जाती रही है. ....इसलिये जब भी उसे पढती या समझने की कोशिश करती हूँ मुझे मार्क्स याद आते हैँ. मार्क्स स्त्री को लेकर जो मूल बात कहता है उसने मुझे उसका मुरीद बना दिया. मार्क्स कह्ता है कि स्त्री दुनिया का अंतिम उपनिवेश है. शुरुआती दौर मेँ मुझे अक्सर यह समझ्ने मेँ कठिनाई होती थी कि मार्क्स ऐसा क्योँ कहता है ? क्या मैँ भी उपंवेश हूँ? माँ भी ? .....और मैँ विचलित होती रही लेकिन धीरे धीरे स्त्री को समझते हुए यह बात समझ मेँ आयी कि वह ऐसा क्योँ कहता है और उसकी बात का असल मर्म तसलीमा और उसके जैसी कई लेखिकाओँ को पढते हुए समझ आया. ............तो मैने बायीँ अदब की बायीँ पसलियोँ को कुछ इस अन्दाज़ से जाना था. .............इस तरह अपनी इस पूरी समझ और अनुभव के साथ इस चर्चा मेँ शामिल होने और नासिरा जी को सुनने पहुँची थी. कार्ड पर नाइस हसन का नाम देखकर मेरे मन मेँ यह सवाल भी उठा कि क्या इस्लाम मेँ स्त्री को लेकर जो सामयिक चर्चायेँ हैँ, स्त्री अधिकारोँ को लेकर जो सामयिक माँग है और जो वास्तविक स्थितियाँ हैँ क्या वह भी उर्दू अदब का हिस्सा बन रही है ? मैँ यह भी जानने को उत्सुक थी कि उर्दू साहित्य मेँ स्त्री की कलम कितनी बेबाक, कितनी निडर है और यह भी कि इस खाने की कलम कार औरत को लेकर अपनी चर्चायेँ किस मुकाम तक ले जाती हैँ. पर कुछ ऐसी निराशा हाथ लेकर लौटी कि तब से सोच रही हूँ कि आखिर क्या हुआ जो उम्र के इस पडाव पर नासिरा शर्मा वहीँ खडी दिख रही हैँ जहाँ से स्त्री ने अपने अधिकारोँ की बात शुरु की थी .............क्योँकि वो कहती हैँ
‘’ नयी जेनेरेशन की स्त्रियोँ ने जो मर्द के खिलाफ जो एक गद्द लिखना शुरु किया है वो गद्द नहीँ वो विलाप है वो विलाप हम कर सक्ते हैँ , हम साथ भी दे सक्ते हैँ लेकिन आर्ट का बदा नुकसान हो जाता है ................
कहानियाँ मैँ पढती हूँ नयी जेनेरेशन की वो बडी खूबसूरती से बयान होते होते एक दम से नारे मेँ बदल जाती है. तो धक्का लगता है या तो स्त्री विमर्श कर लो या फिर गद्द लिख लो ........
और वो बहादुर औरतेँ हैँ कहाँ जो एक वक्त मेँ सबको धराशायी कर देती हैँ .. लाओ..ये मुट्ठी भर औरतेँ जो बैठी हैँ जो बडे बडे दफ्तरोँ मेँ दिख जाती हैँ दिख जाती हैँ ....
मर्दोँ को छोड दिया गया है .........उनकी , कुंठायेण क्या हैँ .......उनके गम क्या हैँ परेशानियाँ क्या हैँ वो क्या सोचते हैँ उनको तो हमदर्दी से हम इंसान समझ् कर हैन्ड्ल ही नहीँ करते .हम पैदा करते हैँ मर्दोँ को और हम अपने अगेंस्ट तालीम देते हैँ उंको कि बेटा जब बीवी आये तो ‘’
Friday, October 5, 2018
Friday, October 13, 2017
नहीं लगता मन उसके गांव
विवाह कितने साल पहले हुआ
इसके लिये उंग्लियो का सहरा लेना पडता है
पीछे पलट कर देखना पडता है
सीते पिरोते अपने होने के सच को
एक बार फ़िर याद करना पडता है
सालों पहले से बिसर गये अपने नाम को
बार बार गोहराना पडता है
डूबते दिनो के दर्द को याद करने से गुजरना पड्ता है
पलट कर देखने पर
बाबुल का घर और उसका लाड एक खीझ पैदा करता है
पांव मानते ही नहीं जिद में रह्ते हैं
वहीं जाने की कवायद में जुते रह्ते हैं
हर बार जाने कितनी ही मिन्नतों
आग्रहों का सहारा लेना पडता है
कि मन और पांव दोनों को राहत मिले
उठते – बैठते सोचती हूं
तानों- उलाहनों से भरी चौखट
आखिर कैसे दे सकती है सुकून
कैसे बज सकती है रुनझुन
कैसे हो सकती है
किसी फ़िल्मी हेरोईन सी मुस्कान
कैसे हो सकता है ये सब
पूरे मन से , भाव से
जब मन और तन दोनों पर रस्सियों से गतर दिये जाने
का आभास हो
कैसे लग सकता है वह घर अपन
इसलिये
कभी नहीं लगा मुझे पिया का घर प्यारा
Friday, August 4, 2017
अनामिका, कल्पित और अभद्र पोस्ट
अब तक अनामिका का नाम बस एक सुना हुआ नाम था मेरे लिये इस ग्यान के साथ कि वह हिन्दी की एक कवियत्री हैं. लेकिन कल एक कवि की वाल ने मुझे अनामिका के बारे में जानने और उन्हें पढने को मजबूर किया क्योंकि उस कवि ने कुछ ऐसा लिखा था जिसे लेकर फ़ेसबूक पर नाराजगियों और विरोध का दौर शुरू हो गया था. अमूमन हर कवियत्री और उससे जुडी प्रबुद्ध महिलायें उस कवि को लानतें मलानतें भेज रही थीं. जब पडताल करनी शुरू कि तब पता लगा कि कवि महोदय ने भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार के संदर्भ को लेकर ना केवल अनामिका के चुनाव पर प्रश्न उठाये थे बल्कि उनकी निजी जिन्दगी को भी घसीट लिया है. कवि का नाम है कृष्ण कल्पित और वो अपनी वाल पर लिखते हैं,
“ अनामिका पिछले एक वर्ष से बहुत युवा कवियों को अपनी कविता के साथ घर बुलाती रही हैं. उन्होंने उनमें से एक जवान कवि चुनाव किया है. इसमें किसे को क्या ऐतराज हो सकता है ? यह उनका व्यक्तिगत फ़ैसला है , जिसका हमें स्वागत करना चाहिये. ”
इसके बाद वो हैश ट्रैक का निशान बनाकर भारत भूष्ण पुरस्कार _ २०१७ लिखते हैं
और फ़िर लिखा जाता है – किसी को दाढी वाला पसन्द है और किसी को सफ़ाचट. अपनी अपनी सौन्दर्याभिरुचि है.
इसीलिये इस संदर्भ में पहले बात अनामिका और उनके निजी निर्णय की. अनामिका का निजी जीवन कैसा और क्यों रहा इसमें मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है और ना ही दिल चस्पी इसमें है कि उन्होंने फ़िलहाल किसका चुनाव किया क्योंकि कोई भी स्त्री या पुरुष अपने लिये किसी का भी चुनाव कर सकता है. वह जवान भी हो सकता है बूढा भी, दाढी वाला भी और सफ़ाचट भी क्योंकि सबकी अपनी अपनी ......... इसीलिये उनका चुनाव उनके निजी जीवन, निजी फ़ैसले का हिस्सा है और अगर कोई उनके इस चुनाव पर अभद्र टिप्पणी करता है , मज़ाक उडाता है और इस तरह की पोस्ट लिखता है तो उसको सभ्य लोगों सहित स्त्रियों के विरोध का भागी बनना ही पडेगा और इसी लिये कल्पित की इस पोस्ट की पूरे तौर पर भरपूर आलोचना स्त्री, उसके आत्म सम्मान, और उसके चुनाव के संदर्भ में जरूर होनी चाहिये और भरपूर होनी चाहिये क्योंकि उन्होंनें अपनी पोस्ट में अनामिका के लिये जिन शब्दों, जिन व्यंजनाओं और जिन भावों का चुनाव किया है वह बेहद निर्लज्ज, भद्दे और अपमानजनक है. आप देखें, “उन्होंने उनमें से एक जवान कवि का चुनाव किया है’” और फ़िर लिखा जाता है – “किसी को दाढी वाला पसन्द है और किसी को सफ़ाचट. अपनी अपनी सौन्दर्याभिरुचि है” यदि यह मान भी लिया जाये कि अनामिका ने इस पुरस्कार देने, कविता का चुनाव करने और दबाव बनाने में अपनी कोई भूमिका निभाई भी है तो भी उनके निजी जीवन, उसके फ़ैसले को लेकर इस तरह की भाषा और भाव का खुलेआम प्रयोग करना इस बात का प्रमाण है कि कल्पित स्त्री संदर्भों को लेकर एक संवेदन हीन व्यक्ति हैं और इस लिहाज से उनकी कविता भी आधी आबादी की कविता होने में संदेह पैदा करती है. बहर हाल कल्पित के इस कृत्य के लिये उनकी भरपूर आलोचना हो रही है, होगी और होनी भी चाहिये. एक स्त्री होने के नाते, स्त्री संदर्भों के लिये काम करने के नाते मैं कल्पित की इस पोस्ट की कडी निंदा करती हूं. पर सोचती हूं कि आखिर कल्पित को यह मौका मिला क्यों? और क्या वजह थी कि कल्पित ने अनामिका के निजी जीवन पर चोट करने की जुर्रत की..........क्योंकि कल्पित कोई मूढ व्यक्ति नहीं हैं. वह कवि हैं और खुद कहते हैं कि यह अश्लील समय है तो फिर वह इतने अश्लील और अभद्र क्यों और कैसे हो गये ? आखिर भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार को लेकर वह इतने चोटिल क्यों हो गये ? क्या वजह थी कि उन्होंने चोट करने के लिये अनामिका को ही चुना ? और समिति के बाकी सदस्यों पर कोई सवाल नहीं उठाये ? यह ना केवल सोचने वाली बात है बल्कि इस पुरस्कार के संदर्भ को लेकर पडताल करने वाली बात भी है .
भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार तार सप्तक के कवि भारत भूषण अग्रवाल के नाम पर उनकी पत्नी बिन्दू जी ने इसे १९७८ या ७९ में आरंभ किया था. मंशा यह थी कि इस पुरस्कार के बहाने हर साल एक युवा कवि को पुरस्कृत और प्रोत्साहित किया जायेगा. मैं जब इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढती थी तब मैं इस पुरस्कार के बारे में परिचित हुई. मेरे ही आस पास के एक दो मित्रों को जब यह पुरस्कार मिला तो अचम्भे से मैं उन्हें देखती रही और कई कानाफ़ूसियों और विवादों को सुनती रही. यह बात मैं १९९० - ९१ की बता रही हूं. इसलिये हिन्दी कविता, उससे जुडे पुरस्कार और विवाद का लम्बा नाता है इस बात से मैं पूरी तरफ़ वाकिफ़ हूं. मैं जिस वक्त का जिकर कर रही हूं उस वक्त भारत भूषण पुरस्कार को लेकर जो चौकडी होती थी उसमें कुछ ऐसे नाम थे जिनके सामने जाने और खडे होने में हिन्दी साहित्य के लोगों की आज भी घिग्घी बंध जाती है. और मैं उसे चौकडी इसलिये कहती हूं क्योंकि वो लोग किसी सामंत की तरह मनमाने तरीके से कविताओं का चुनाव करते और उसे साल की कविता और कवि को साल का कवि घोषित कर देते. ......और मजे की बात तो यह है कि उनकी नज़र में कवियत्रियां कम ही आती थीं जबकि महिलायें उस दौर में भी लिख रही थीं और अच्छा लिख रही थीं. इस तरह भारत भूषण पुरस्कार की जहां तक बात है तो इस पुरस्कार को देने में हमेशा एक चौकडी का हाथ रहा है. चौकडी के सदस्यों का नाम जरूर बदलता रहा है लेकिन तरीका कमोबेश एक ही रहा है. समिति की निणर्नायक मंडल में फ़िलहाल – अशोक बाजपेयी, अरुंण कमल, उदय प्रकाश अनामिका और पुरुषोत्तम अग्रवाल हैं जो हर वर्ष बारी बारी से वर्ष की सर्व श्रेष्ठ कविता का चुनाव कर उन्हें पुरस्कृत करते हैं. कहा जा रहा है कि इस बार अनामिका की भूमिका प्रमुख थी.
जहां तक ताजा संदर्भ का सवाल है यहां मैं यह नहीं जानती कि जिस कविता और कवि का चुनाव किया गया है उसमें और अनामिका के व्यक्तिगत फ़ैसले में कितना लिंक है लेकिन एक बात तो तय है कि यदि उनका निजी जीवन और उसका फ़ैसला उनके निजी जीवन के दायरों से निकल कर लोक जीवन के किसी हिस्से, विधा या अन्य को प्रभावित करेगा तो एक बात वैधानिक चेतावनी की तरह याद रखना होगा कि तब यह सबकुछ विवाद का हिस्सा होगा ही. यह तब और भी होगा जब चुनाव में अहम भूमिका निभाने का भार होगा जैसा कि कहा जा रहा है. .....
पर मुझे यहां एक बात सोचने पर मजबूर कर रही है कि माना कि कविता के चुनाव में अनामिका की अहम भूमिका थी लेकिन अन्य सदस्य क्या माटी के माधो बने बैठे थे ? वो क्या कर रहे थे ? क्या वो अनामिका से डर रहे थे या फ़िर अनामिका इतनी प्रभावशाली हैं कि उनके प्रभाव के आगे उनकी एक ना चली? और अगर ऐसा नहीं है तो मतलब कि जो चुनाव किया गया उसमें सबकी सहमति थी? फ़िर अनामिका की आलोचना पर सब चुप क्यों हैं ? अशोक बाजपेयी, पुरुषोत्तम अग्रवाल, अरुण कमल और उदय प्रकाश कहां हैं? अगर वो चुप हैं तो मतलब वो कल्पित का कहीं ना कहीं समर्थन कर रहे हैं ............अगर नहीं तो समिति के सदस्य के रूप में सामने आकर कहें कि यह चुनाव हम सब का है और इस तरह की टिप्पणी का हम ना केवल विरोध करते हैं बल्कि ऐसे कवियों का बायकाट करते हैं .............लेकिन पिछले कई दिनों से ऐसा कुछ नहीं हुआ ...............
मैं इसके कई मतलब निकाल रही हूं. मतलब यह कि अनामिका अकेली हैं और उनका चुनाव उनका निज़ी फ़ैसला होते हुए भी उनके साथ के लोगों ( समिति के सद्स्यों ) को भी हज़म नहीं हुआ. मतलब यह कि बडी बडी बातें करने और लिखने वाले अंतत: मर्द वादी ही हैं. मुझे याद है मेरे विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के एक प्रोफ़ेसर जो इस पुरस्कार से जुडे रहे हैं और जिनके दो शिष्यों को यह पुरस्कार एक के बाद एक मिला भी ...अपनी महिला मित्रों के लिये खासे चर्चित रहे हैं ना केवल इलाहाबाद में बल्कि साहित्य जगत में भी और मैने उनके सहयोगियों को उनके पक्ष में खडे होते और साथ देते हुए देखा है ............. तो अपने फ़ैसलों के साथ अनामिका अकेले क्यों हैं ? क्यों उनके ऊपर होने वाली अभद्र टिप्प णी पर साहित्य के पुरोधा अपनी कलम नहीं उठा रहे हैं ? जो भी हो तमाम बातों के बावजूद भी हिन्दी साहित्य और उसके लेखकों को जेंडर सेंस्टिव होने की जरूरत है , उन्हें इस संदर्भ में एक कडी ट्रेनिंग की भी जरूरत है वर्ना वो हमारा वक्त वैसे ही लिखेंगे जैसे लिख रहे हैं और अनामिका जैसी लेखिकाओं को सजगता से चलते हुए बेहद निष्पक्शः होकर अपना समय लिखना होगा और अपना फ़ैसला लेना होगा .....(मैं निजी फ़ैसले की बात नहीं कर रही) कल्पित और मौन रहकर उनके साथ खडे लोगों को हराने का यही तरीका होना चाहिये
डा. अलका
“ अनामिका पिछले एक वर्ष से बहुत युवा कवियों को अपनी कविता के साथ घर बुलाती रही हैं. उन्होंने उनमें से एक जवान कवि चुनाव किया है. इसमें किसे को क्या ऐतराज हो सकता है ? यह उनका व्यक्तिगत फ़ैसला है , जिसका हमें स्वागत करना चाहिये. ”
इसके बाद वो हैश ट्रैक का निशान बनाकर भारत भूष्ण पुरस्कार _ २०१७ लिखते हैं
और फ़िर लिखा जाता है – किसी को दाढी वाला पसन्द है और किसी को सफ़ाचट. अपनी अपनी सौन्दर्याभिरुचि है.
इसीलिये इस संदर्भ में पहले बात अनामिका और उनके निजी निर्णय की. अनामिका का निजी जीवन कैसा और क्यों रहा इसमें मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है और ना ही दिल चस्पी इसमें है कि उन्होंने फ़िलहाल किसका चुनाव किया क्योंकि कोई भी स्त्री या पुरुष अपने लिये किसी का भी चुनाव कर सकता है. वह जवान भी हो सकता है बूढा भी, दाढी वाला भी और सफ़ाचट भी क्योंकि सबकी अपनी अपनी ......... इसीलिये उनका चुनाव उनके निजी जीवन, निजी फ़ैसले का हिस्सा है और अगर कोई उनके इस चुनाव पर अभद्र टिप्पणी करता है , मज़ाक उडाता है और इस तरह की पोस्ट लिखता है तो उसको सभ्य लोगों सहित स्त्रियों के विरोध का भागी बनना ही पडेगा और इसी लिये कल्पित की इस पोस्ट की पूरे तौर पर भरपूर आलोचना स्त्री, उसके आत्म सम्मान, और उसके चुनाव के संदर्भ में जरूर होनी चाहिये और भरपूर होनी चाहिये क्योंकि उन्होंनें अपनी पोस्ट में अनामिका के लिये जिन शब्दों, जिन व्यंजनाओं और जिन भावों का चुनाव किया है वह बेहद निर्लज्ज, भद्दे और अपमानजनक है. आप देखें, “उन्होंने उनमें से एक जवान कवि का चुनाव किया है’” और फ़िर लिखा जाता है – “किसी को दाढी वाला पसन्द है और किसी को सफ़ाचट. अपनी अपनी सौन्दर्याभिरुचि है” यदि यह मान भी लिया जाये कि अनामिका ने इस पुरस्कार देने, कविता का चुनाव करने और दबाव बनाने में अपनी कोई भूमिका निभाई भी है तो भी उनके निजी जीवन, उसके फ़ैसले को लेकर इस तरह की भाषा और भाव का खुलेआम प्रयोग करना इस बात का प्रमाण है कि कल्पित स्त्री संदर्भों को लेकर एक संवेदन हीन व्यक्ति हैं और इस लिहाज से उनकी कविता भी आधी आबादी की कविता होने में संदेह पैदा करती है. बहर हाल कल्पित के इस कृत्य के लिये उनकी भरपूर आलोचना हो रही है, होगी और होनी भी चाहिये. एक स्त्री होने के नाते, स्त्री संदर्भों के लिये काम करने के नाते मैं कल्पित की इस पोस्ट की कडी निंदा करती हूं. पर सोचती हूं कि आखिर कल्पित को यह मौका मिला क्यों? और क्या वजह थी कि कल्पित ने अनामिका के निजी जीवन पर चोट करने की जुर्रत की..........क्योंकि कल्पित कोई मूढ व्यक्ति नहीं हैं. वह कवि हैं और खुद कहते हैं कि यह अश्लील समय है तो फिर वह इतने अश्लील और अभद्र क्यों और कैसे हो गये ? आखिर भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार को लेकर वह इतने चोटिल क्यों हो गये ? क्या वजह थी कि उन्होंने चोट करने के लिये अनामिका को ही चुना ? और समिति के बाकी सदस्यों पर कोई सवाल नहीं उठाये ? यह ना केवल सोचने वाली बात है बल्कि इस पुरस्कार के संदर्भ को लेकर पडताल करने वाली बात भी है .
भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार तार सप्तक के कवि भारत भूषण अग्रवाल के नाम पर उनकी पत्नी बिन्दू जी ने इसे १९७८ या ७९ में आरंभ किया था. मंशा यह थी कि इस पुरस्कार के बहाने हर साल एक युवा कवि को पुरस्कृत और प्रोत्साहित किया जायेगा. मैं जब इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढती थी तब मैं इस पुरस्कार के बारे में परिचित हुई. मेरे ही आस पास के एक दो मित्रों को जब यह पुरस्कार मिला तो अचम्भे से मैं उन्हें देखती रही और कई कानाफ़ूसियों और विवादों को सुनती रही. यह बात मैं १९९० - ९१ की बता रही हूं. इसलिये हिन्दी कविता, उससे जुडे पुरस्कार और विवाद का लम्बा नाता है इस बात से मैं पूरी तरफ़ वाकिफ़ हूं. मैं जिस वक्त का जिकर कर रही हूं उस वक्त भारत भूषण पुरस्कार को लेकर जो चौकडी होती थी उसमें कुछ ऐसे नाम थे जिनके सामने जाने और खडे होने में हिन्दी साहित्य के लोगों की आज भी घिग्घी बंध जाती है. और मैं उसे चौकडी इसलिये कहती हूं क्योंकि वो लोग किसी सामंत की तरह मनमाने तरीके से कविताओं का चुनाव करते और उसे साल की कविता और कवि को साल का कवि घोषित कर देते. ......और मजे की बात तो यह है कि उनकी नज़र में कवियत्रियां कम ही आती थीं जबकि महिलायें उस दौर में भी लिख रही थीं और अच्छा लिख रही थीं. इस तरह भारत भूषण पुरस्कार की जहां तक बात है तो इस पुरस्कार को देने में हमेशा एक चौकडी का हाथ रहा है. चौकडी के सदस्यों का नाम जरूर बदलता रहा है लेकिन तरीका कमोबेश एक ही रहा है. समिति की निणर्नायक मंडल में फ़िलहाल – अशोक बाजपेयी, अरुंण कमल, उदय प्रकाश अनामिका और पुरुषोत्तम अग्रवाल हैं जो हर वर्ष बारी बारी से वर्ष की सर्व श्रेष्ठ कविता का चुनाव कर उन्हें पुरस्कृत करते हैं. कहा जा रहा है कि इस बार अनामिका की भूमिका प्रमुख थी.
जहां तक ताजा संदर्भ का सवाल है यहां मैं यह नहीं जानती कि जिस कविता और कवि का चुनाव किया गया है उसमें और अनामिका के व्यक्तिगत फ़ैसले में कितना लिंक है लेकिन एक बात तो तय है कि यदि उनका निजी जीवन और उसका फ़ैसला उनके निजी जीवन के दायरों से निकल कर लोक जीवन के किसी हिस्से, विधा या अन्य को प्रभावित करेगा तो एक बात वैधानिक चेतावनी की तरह याद रखना होगा कि तब यह सबकुछ विवाद का हिस्सा होगा ही. यह तब और भी होगा जब चुनाव में अहम भूमिका निभाने का भार होगा जैसा कि कहा जा रहा है. .....
पर मुझे यहां एक बात सोचने पर मजबूर कर रही है कि माना कि कविता के चुनाव में अनामिका की अहम भूमिका थी लेकिन अन्य सदस्य क्या माटी के माधो बने बैठे थे ? वो क्या कर रहे थे ? क्या वो अनामिका से डर रहे थे या फ़िर अनामिका इतनी प्रभावशाली हैं कि उनके प्रभाव के आगे उनकी एक ना चली? और अगर ऐसा नहीं है तो मतलब कि जो चुनाव किया गया उसमें सबकी सहमति थी? फ़िर अनामिका की आलोचना पर सब चुप क्यों हैं ? अशोक बाजपेयी, पुरुषोत्तम अग्रवाल, अरुण कमल और उदय प्रकाश कहां हैं? अगर वो चुप हैं तो मतलब वो कल्पित का कहीं ना कहीं समर्थन कर रहे हैं ............अगर नहीं तो समिति के सदस्य के रूप में सामने आकर कहें कि यह चुनाव हम सब का है और इस तरह की टिप्पणी का हम ना केवल विरोध करते हैं बल्कि ऐसे कवियों का बायकाट करते हैं .............लेकिन पिछले कई दिनों से ऐसा कुछ नहीं हुआ ...............
मैं इसके कई मतलब निकाल रही हूं. मतलब यह कि अनामिका अकेली हैं और उनका चुनाव उनका निज़ी फ़ैसला होते हुए भी उनके साथ के लोगों ( समिति के सद्स्यों ) को भी हज़म नहीं हुआ. मतलब यह कि बडी बडी बातें करने और लिखने वाले अंतत: मर्द वादी ही हैं. मुझे याद है मेरे विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के एक प्रोफ़ेसर जो इस पुरस्कार से जुडे रहे हैं और जिनके दो शिष्यों को यह पुरस्कार एक के बाद एक मिला भी ...अपनी महिला मित्रों के लिये खासे चर्चित रहे हैं ना केवल इलाहाबाद में बल्कि साहित्य जगत में भी और मैने उनके सहयोगियों को उनके पक्ष में खडे होते और साथ देते हुए देखा है ............. तो अपने फ़ैसलों के साथ अनामिका अकेले क्यों हैं ? क्यों उनके ऊपर होने वाली अभद्र टिप्प णी पर साहित्य के पुरोधा अपनी कलम नहीं उठा रहे हैं ? जो भी हो तमाम बातों के बावजूद भी हिन्दी साहित्य और उसके लेखकों को जेंडर सेंस्टिव होने की जरूरत है , उन्हें इस संदर्भ में एक कडी ट्रेनिंग की भी जरूरत है वर्ना वो हमारा वक्त वैसे ही लिखेंगे जैसे लिख रहे हैं और अनामिका जैसी लेखिकाओं को सजगता से चलते हुए बेहद निष्पक्शः होकर अपना समय लिखना होगा और अपना फ़ैसला लेना होगा .....(मैं निजी फ़ैसले की बात नहीं कर रही) कल्पित और मौन रहकर उनके साथ खडे लोगों को हराने का यही तरीका होना चाहिये
डा. अलका
Saturday, January 21, 2017
कहने सुनने के लमहों से निकल कर
एक कोना रीता ही रह गया है
सूना सूना
कहने सुनने के लमहों से निकल कर
एक अंधेरी कोठरी पकड ली है
सुकून की ठंढ के लिये
सालों जिद की थी
अपने उगने के लिये
सब सील गयी है
छट्पटाहट दम दोडकर
चुप है
कहीं कोने में दुबकी पडी
कलम और शब्द
सब कैद हैं
उस लोहे की आलमारी में
जिसे खोलने में अब हाथ सिहर जाते हैं
और उंगलियां टेढी हो
विफ़र उठती हैं
अजीब वक्त है,
बदला बदला
अजीब जगह है
दुश्मन सरीखी
जो सारे शौक, हुनर और पसंद को
तहखाने में डाल देने को
आमादा कर
सलीका बताती है
और मुंह पर जबरन उंगली रख
चुप हो जाने को
बेहतर चरित्र का लाबाद ओढा
मुस्कुराती है
अजीब लोग हैं
बडी बडी डिग्रियों के साथ
अनपढ
कलम से चिढे
शब्द से डरे
सारे अधिकारों कानूनों से
अनजान
इस गहरे अवसाद
उसके घात के बाद भी
मन अभी जिन्दा है
सोचता है,
स्थितियों पर विचार करता हुआ
टपक भी जाता है
कौन समझेगा कि
एक अंधेरा कमरा फ़िर
जीना चहता है
फ़िर से उगने के लिये
अल्का
सूना सूना
कहने सुनने के लमहों से निकल कर
एक अंधेरी कोठरी पकड ली है
सुकून की ठंढ के लिये
सालों जिद की थी
अपने उगने के लिये
सब सील गयी है
छट्पटाहट दम दोडकर
चुप है
कहीं कोने में दुबकी पडी
कलम और शब्द
सब कैद हैं
उस लोहे की आलमारी में
जिसे खोलने में अब हाथ सिहर जाते हैं
और उंगलियां टेढी हो
विफ़र उठती हैं
अजीब वक्त है,
बदला बदला
अजीब जगह है
दुश्मन सरीखी
जो सारे शौक, हुनर और पसंद को
तहखाने में डाल देने को
आमादा कर
सलीका बताती है
और मुंह पर जबरन उंगली रख
चुप हो जाने को
बेहतर चरित्र का लाबाद ओढा
मुस्कुराती है
अजीब लोग हैं
बडी बडी डिग्रियों के साथ
अनपढ
कलम से चिढे
शब्द से डरे
सारे अधिकारों कानूनों से
अनजान
इस गहरे अवसाद
उसके घात के बाद भी
मन अभी जिन्दा है
सोचता है,
स्थितियों पर विचार करता हुआ
टपक भी जाता है
कौन समझेगा कि
एक अंधेरा कमरा फ़िर
जीना चहता है
फ़िर से उगने के लिये
अल्का
Sunday, June 21, 2015
आज ’फ़ादर्स डे’ है
फ़ेसबुक ने याद दिलाया कि आज ’फ़ादर्स डे’ है मतलब
पिता को याद करने का दिन. मेरे ७३ साल के पिता को याद करना मुझे कई मौसमों से गुजरने जैसा लगता है. उन्हें याद करना जैस जाडों की नर्म और गर्म धूप को याद करद्ने जैसा है, कई बार उन्हें याद करना जैसे बारिश की पहली फ़ुहार को याद करना है और कई बार उन्हें याद करना जून की भरी दुपहरी की चटखती धूप को सहने जैसा भी है जैसे रेगिस्तान की गर्म रेत पर नंगे पांव चलने और जलने जैसा. एक लम्बा वक्त मैने इसी अहसास के साथ बिताया है उनके साथ. क्योंकि जैसे जैसे मैं बडी होने लगी थी उनके अन्दर का पिता एक अजीब खोल को ओढने लगा था. एक अनजान पुरुष उनके अन्दर अवतरित होने लगा था जिससे मैं कतई परिचित नहीं थी और उनके जीवन दर्शन से मैं टकराने लगी थी. अक्सर उनकी सोच को मैं डरते डराते ही सही चुनौती देने लगी थी. सच कहूं तो पापा के साथ मेरे रिश्ते कभी सामन्य नहीं रहे इसलिये आज जब भी मैं उन्हें सोचती हूं, उनसे मिलती हूं, उन्हें याद करती हूं तो अपनी उमर के सारे रास्तों और गलियारों से गुजर जाती हूं.. दूर खडी हो जब भी उनको देखती हूं मुझे अक्सर एक पुरुष दिखता है जो कई डोरियों से बंधा है. कई बार मैं उन्हें उन डोरियों में तडपता हुआ देखती हूं और कई बार उन सख्त होती डोरियों के बीच तन के खडा होता हुआ एक बेचारा देखती हूं. उनके साथ का कोई पल भूली नहीं हूं मैं. उनके साथ के अच्छे बुरे हर पल मुझे याद हैं. याद क्या जैसे गडे हुए हैं मेरी स्मृतियों में. वो कुछ इस तरह गडे हैं जैसे कल ही की तो बात है..
सोच रही हूं कब से जानती हूं उन्हें मैं? सही कहूं तो सोच रही हूं कि कब से पहचानती हूं उन्हें मैं? मां कहती थी बच्छा तो मां के गर्भ से पिता को पहचानता है....पर मुझे पापा का पहला अक्स याद आता है जब वो मुझे कुछ बनाने के बडे बडे सपने पाले अम्मा से बतिया रहे हैं...... एक अक्स जो आंखों में छपा है जब वो मुझे घुघुआ मन्ना कराते थे.........एक अक्स और है जब वो मुझे कन्धे पर चढा लेते थे...........थोडी देर बाद फ़िर एक चित्र आंखों के सामने घूमता है..फ़िर एक और........फ़िर एक और .............और तब से लेकर अब तक के वो सारे पल मेरी निगाहों में कैद हैं जो पापा और मेरे रिश्ते के बीच है..............मां कहती थी मेरी पैदाइश पर पापा थोडे मायूस थे पर मैने ये मायूसी कभी अपनी यादाश्त में महसूस नहीं की. इसीलिये पापा मेरे लिये गर्म घूप की तरह हैं आज भी. इसीलिये अपने बचपन के पापा को जब भी मैं याद करती हूं तो गुस्सैल पापा कभी याद नहीं आते मुझे.......हां उनकी बडी बडी आंखों ने कभी कभार मुझे डराया जरूर है...............सच कहूं तो बचपन में मां बाप के साथ बच्चों का रिश्ता एक अजीब बन्धन से बंधा होता है, एक अजीब अहसास से सराबोर........
पापा को बहुत कुछ मां के शब्दों से जाना है इसीलिये जब भी पापा को याद करती हूं मां का भी कोने में खडी म्लती है मुझे...बडी सी लाल बिन्दी लगाये लाल बार्डर की सफ़ेद साडी में.........कभी मुस्कुराते हुए ...कभी गुस्से में ......कभी आंखे तरेरते हुए...............कभी पापा से एक अजीब भाषा में बतियाती हुई ...........मां जैसे पिता के रोल को समझाने की काउन्सलर हो............. पापा और मेरे रिश्ते की एक्स्पर्ट........मेरा मानना है कि पिता को बच्चे आधे से अधिक मां के शब्दों से जानते हैं............उसके मनोभाव से समझते हैं.......... और मैने भी पापा को अम्मा के रहते ऐसे ही जाना था............... आज मां नहीं है तो पापा बांध तोड कर हमारे और करीब आ गये हैं जैसे मां ..........जैसे उसका आंचल ........पिछले १६ साल से मां के बाद मेरे लिये पापा जैसे मां अधिक हो गये हैं .......... कई बार एक ऐसे बच्चे जिसे मां ही सम्भालना जानती थी ..... अब तो लगता है जैसे हम मां बाप हैं और वो बच्चा......एक जिद्दी बच्चा...........................पापा आपके होने का बहुत मतलब है जीवन में ..................बहुत बहुत मतलब है ...
पिता को याद करने का दिन. मेरे ७३ साल के पिता को याद करना मुझे कई मौसमों से गुजरने जैसा लगता है. उन्हें याद करना जैस जाडों की नर्म और गर्म धूप को याद करद्ने जैसा है, कई बार उन्हें याद करना जैसे बारिश की पहली फ़ुहार को याद करना है और कई बार उन्हें याद करना जून की भरी दुपहरी की चटखती धूप को सहने जैसा भी है जैसे रेगिस्तान की गर्म रेत पर नंगे पांव चलने और जलने जैसा. एक लम्बा वक्त मैने इसी अहसास के साथ बिताया है उनके साथ. क्योंकि जैसे जैसे मैं बडी होने लगी थी उनके अन्दर का पिता एक अजीब खोल को ओढने लगा था. एक अनजान पुरुष उनके अन्दर अवतरित होने लगा था जिससे मैं कतई परिचित नहीं थी और उनके जीवन दर्शन से मैं टकराने लगी थी. अक्सर उनकी सोच को मैं डरते डराते ही सही चुनौती देने लगी थी. सच कहूं तो पापा के साथ मेरे रिश्ते कभी सामन्य नहीं रहे इसलिये आज जब भी मैं उन्हें सोचती हूं, उनसे मिलती हूं, उन्हें याद करती हूं तो अपनी उमर के सारे रास्तों और गलियारों से गुजर जाती हूं.. दूर खडी हो जब भी उनको देखती हूं मुझे अक्सर एक पुरुष दिखता है जो कई डोरियों से बंधा है. कई बार मैं उन्हें उन डोरियों में तडपता हुआ देखती हूं और कई बार उन सख्त होती डोरियों के बीच तन के खडा होता हुआ एक बेचारा देखती हूं. उनके साथ का कोई पल भूली नहीं हूं मैं. उनके साथ के अच्छे बुरे हर पल मुझे याद हैं. याद क्या जैसे गडे हुए हैं मेरी स्मृतियों में. वो कुछ इस तरह गडे हैं जैसे कल ही की तो बात है..
सोच रही हूं कब से जानती हूं उन्हें मैं? सही कहूं तो सोच रही हूं कि कब से पहचानती हूं उन्हें मैं? मां कहती थी बच्छा तो मां के गर्भ से पिता को पहचानता है....पर मुझे पापा का पहला अक्स याद आता है जब वो मुझे कुछ बनाने के बडे बडे सपने पाले अम्मा से बतिया रहे हैं...... एक अक्स जो आंखों में छपा है जब वो मुझे घुघुआ मन्ना कराते थे.........एक अक्स और है जब वो मुझे कन्धे पर चढा लेते थे...........थोडी देर बाद फ़िर एक चित्र आंखों के सामने घूमता है..फ़िर एक और........फ़िर एक और .............और तब से लेकर अब तक के वो सारे पल मेरी निगाहों में कैद हैं जो पापा और मेरे रिश्ते के बीच है..............मां कहती थी मेरी पैदाइश पर पापा थोडे मायूस थे पर मैने ये मायूसी कभी अपनी यादाश्त में महसूस नहीं की. इसीलिये पापा मेरे लिये गर्म घूप की तरह हैं आज भी. इसीलिये अपने बचपन के पापा को जब भी मैं याद करती हूं तो गुस्सैल पापा कभी याद नहीं आते मुझे.......हां उनकी बडी बडी आंखों ने कभी कभार मुझे डराया जरूर है...............सच कहूं तो बचपन में मां बाप के साथ बच्चों का रिश्ता एक अजीब बन्धन से बंधा होता है, एक अजीब अहसास से सराबोर........
पापा को बहुत कुछ मां के शब्दों से जाना है इसीलिये जब भी पापा को याद करती हूं मां का भी कोने में खडी म्लती है मुझे...बडी सी लाल बिन्दी लगाये लाल बार्डर की सफ़ेद साडी में.........कभी मुस्कुराते हुए ...कभी गुस्से में ......कभी आंखे तरेरते हुए...............कभी पापा से एक अजीब भाषा में बतियाती हुई ...........मां जैसे पिता के रोल को समझाने की काउन्सलर हो............. पापा और मेरे रिश्ते की एक्स्पर्ट........मेरा मानना है कि पिता को बच्चे आधे से अधिक मां के शब्दों से जानते हैं............उसके मनोभाव से समझते हैं.......... और मैने भी पापा को अम्मा के रहते ऐसे ही जाना था............... आज मां नहीं है तो पापा बांध तोड कर हमारे और करीब आ गये हैं जैसे मां ..........जैसे उसका आंचल ........पिछले १६ साल से मां के बाद मेरे लिये पापा जैसे मां अधिक हो गये हैं .......... कई बार एक ऐसे बच्चे जिसे मां ही सम्भालना जानती थी ..... अब तो लगता है जैसे हम मां बाप हैं और वो बच्चा......एक जिद्दी बच्चा...........................पापा आपके होने का बहुत मतलब है जीवन में ..................बहुत बहुत मतलब है ...
Tuesday, June 16, 2015
जिन्दगी जीते हुए
<मैनें अपनी सगाई तोड दी थी. लडका मुझे किसी हाल में पसन्द नहीं था लेकिन घर वालों के दबाव के आगे मैं कुछ नहीं बोल पायी थी और फ़ैज़ाबाद के एक होटल में घर वालों के पीछे पीछे सगाई करने चली गयी थी. मेरा मन किसी हाल में मेरे हाथ में पडी अंगूठी को स्वीकार नहीं कर पा रहा था. सगाई होने के दूसरे दिन ही मैने अंगूठी उतार कर आलमारी में रख दी थी. घर वालों के चेहरे पर छाई खुशी मुझे अक्सर अपने मन की बात कहने से रोक देती थी और मैं चुप हो जाती थी लेकिन उस लडके से विवाह ना करने की इच्छा इतनी बलवती थी कि मैं उस अन्गूठी को किसी रूप में स्वीकार नहीं कर पा रही थी. बहरहाल मैं चुप चाप घर में चल रही तैयारियों को देखती और विश्वविद्यालय चली जाती लेकिन एक दिन खुद लडके के पिता ने मुझे इस सगाई से ना कहने का मौका दे दिया और मैने फ़ौरन इस विवाह से ना करने में देर नहीं की.
इस सगाई के टूटने के बाद घर का माहौल एक अज़ीब सी खामोशी में तब्दील हो गया. एक ऐसी वीरानी छा गयी थी जिसमें मुझे सांस लेने में घुटन सी होने लगी थी. मां की आन्खों के सूनेपन में कई सवाल और बेचैनी रहने लगी. दो छोटे भाई जो मुझे बेहद प्यार करते थे घर में सबसे कमजोर स्थिति में थे और पिता एक अज़ीब परायी नज़र से देखते जबकि दहेज़ के बेलगाम घोडे की लगाम थाम के ही मैने इस विवाह से ना की थी. अकेली लडकी जरूर थी लेकिन अपने इमानदार पिता की आर्थिक हदें जानती थी सो पूरे परिवार को गड्ढे में ढकेलने से बेहतर मैने इस लाव लश्कर वाले विवाह को ना करना ही बेहतर समझा. मैं नहीं जानती थी कि परिवार के सदस्यों के मन में क्या क्या चल रहा था लेकिन मुझे अपने घर में वह नही मिल रहा था जो इससे पहले तक मिलता आया था. मां ने तो जैसे खाट ही पकड ली थी और कोई सात महीने बाद इस दुनिया को छोड भी चलीं लेकिन मैं इस घर की घुटन से निकलना चाहती थी और मैने अपने बडे भाई के पास भोपाल जाने का फ़ैसला लिया.
भोपाल भारत का एक खूबसूरत शहर. एक ऐसा शहर जहां रहने का अहसास आपको प्रकृति के करीब रखता है लेकिन मैं अपनी जिन्दगी में आये इस दौर से अन्दर तक आहत थी. समझ में नहीं आता था कि क्या करूं. मन इतना अशान्त था कि कई बार आत्महत्या करने को जी करता. कई बार मन होता अम्मा की गोद से लिपट लिपट कर खूब रोऊ. पर मां ने जैसे अपने को अपने अन्दर समेट लिया था. कई बार सोचती जो पापा इतना प्यार करते थे वो इस तरह क्यों हो गये. अपने इन मनोभाओं के साथ मैं अपने भाई और भावज़ के घर गयी थी. उन्होंने इसी साल की ३ फ़रवरी को शादी की थी. इस तरह की मनोदशा में लिये गये फ़ैसले शायद अक्सर गलत होते हैं मेरा यह फ़ैसला भी गलत था इसका अहसास मुझे भाई के घर में घुसते ही होने लगा था फ़िर भी उन लोगों ने मुझे एक महीने किसी तरह बर्दाश्त किया. इन एक महीनों में मैने रिश्तों के बदतले तेवर को महसूस किया. वह भाई जो साल भर पैसे जुटाता था कि मुझे राखी पर कोई उपहार दे सके एक अज़ीब कशमकश में रहता. मुझसे बात करने के लिये शब्द उसके गले तक आकर अटक जाते थे. मुझे बडी मरणांतक पीडा होती. मै समझने लगी थी कि यह जगह मेरी नहीं है अभी यह ठीक से समझकर मैं कोई फ़ैसला कर पाती एक दिन उसने मुझे अपने आफ़िस के एक एक वर्कर के साथ मुझे एक ऐसी जगह भेज दिया जहां के जीवन की मैने कभी कल्पना नहीं की थी.
मैं उत्तर प्रदेश के एक ठीक ठाक मध्यम वर्गीय परिवार की तीन भाइयों के बीच की अकेली लडकी थी. तीन भाईयों के बीच होने के कारण थोडी दुलारी नकचढी और बेहतर जिन्दगी के सपने देखने वाली और अचानक यह बेतूल जिले के चिखली ब्लाक के जन्गलों के बीच के एक गांव में फ़ील्ड के अनुभव के नाम पर काम करने लिये भेज दिया जाना................ मैं भाई के इस फ़ैसले को कई दिनों तक समझ नहीं पाई थी. मेरे लिये बेतूल जिला एक अनजान और बहुत अज़ीब सा जिला था. अपनों से दूर वीरान में सांप बिच्छुओं के बीच एक ऐसी झोपडी में जीना जहां अगल बगल सांप और चूहों के चलने की आवजें आती हों बेहद डरावना था लेकिन अपने जीवन की इन परिस्थितियों में मैने इसे अपना भाग्य मान लिया था ..........मां अक्सर बहुत याद आती. उसका लाड और दुलार याद आता.......ठोडा सा बुखार होने पर उसका चादर ओढाना, सिर में तेल लगाना .....सिरहाने बैठे रहना सब याद आता ...........पापा का संरक्षण और गुस्सा याद आता ......मेरे दोनों छोटे भाई याद आते ...पर जिन्दगी कुछ ऐसे जाल में उलझ गयी थी कि मैं उनकी आवज सुनने को तरस गयी थी .................एक रात जब पेशाब करने के लिये बाहर जाते वक्त जब एक मोटा सांप दरवाजे पर था तो जिन्दगी जैसे खत्म सी लगी ..........उस रात के बाद जितने दिन मैं वहां रही रात में सोयी नहीं ....धीरे धीरे मैने अपने को काम में रमाना शुरू किया लेकिन अक्सर मेरे दिमाग में आता भाई तो जानता था मुझे फ़िर उसने मुझे यहां क्यों भेजा ??? अक्सर इन्हीं सवालों में उलझकर मैं एक गां से दूसरे गांव के रास्ते नापती. कभी रोती, कभी अपने से सवाल करती और कभी छोटे छोटे टीलों पर बसे गां वों में रहने वालों को देखकर अपने जीवन से उनकी तुलना करती. धीरे धीरे मैने उस पूरी जमात के दुख दर्द और रहन सहन को जानना शुरू किया जो इन्हीं परिस्थितियों में पैदा होते हैं और जीते हैं ...जो इससे इतर जीवन जानते ही नहीं.......अक्सर मैं अपने जीवन से उनकी तुलना करती और मेरी पीडा धीरे धीरे कम होने लगती. ...........
इस सगाई के टूटने के बाद घर का माहौल एक अज़ीब सी खामोशी में तब्दील हो गया. एक ऐसी वीरानी छा गयी थी जिसमें मुझे सांस लेने में घुटन सी होने लगी थी. मां की आन्खों के सूनेपन में कई सवाल और बेचैनी रहने लगी. दो छोटे भाई जो मुझे बेहद प्यार करते थे घर में सबसे कमजोर स्थिति में थे और पिता एक अज़ीब परायी नज़र से देखते जबकि दहेज़ के बेलगाम घोडे की लगाम थाम के ही मैने इस विवाह से ना की थी. अकेली लडकी जरूर थी लेकिन अपने इमानदार पिता की आर्थिक हदें जानती थी सो पूरे परिवार को गड्ढे में ढकेलने से बेहतर मैने इस लाव लश्कर वाले विवाह को ना करना ही बेहतर समझा. मैं नहीं जानती थी कि परिवार के सदस्यों के मन में क्या क्या चल रहा था लेकिन मुझे अपने घर में वह नही मिल रहा था जो इससे पहले तक मिलता आया था. मां ने तो जैसे खाट ही पकड ली थी और कोई सात महीने बाद इस दुनिया को छोड भी चलीं लेकिन मैं इस घर की घुटन से निकलना चाहती थी और मैने अपने बडे भाई के पास भोपाल जाने का फ़ैसला लिया.
भोपाल भारत का एक खूबसूरत शहर. एक ऐसा शहर जहां रहने का अहसास आपको प्रकृति के करीब रखता है लेकिन मैं अपनी जिन्दगी में आये इस दौर से अन्दर तक आहत थी. समझ में नहीं आता था कि क्या करूं. मन इतना अशान्त था कि कई बार आत्महत्या करने को जी करता. कई बार मन होता अम्मा की गोद से लिपट लिपट कर खूब रोऊ. पर मां ने जैसे अपने को अपने अन्दर समेट लिया था. कई बार सोचती जो पापा इतना प्यार करते थे वो इस तरह क्यों हो गये. अपने इन मनोभाओं के साथ मैं अपने भाई और भावज़ के घर गयी थी. उन्होंने इसी साल की ३ फ़रवरी को शादी की थी. इस तरह की मनोदशा में लिये गये फ़ैसले शायद अक्सर गलत होते हैं मेरा यह फ़ैसला भी गलत था इसका अहसास मुझे भाई के घर में घुसते ही होने लगा था फ़िर भी उन लोगों ने मुझे एक महीने किसी तरह बर्दाश्त किया. इन एक महीनों में मैने रिश्तों के बदतले तेवर को महसूस किया. वह भाई जो साल भर पैसे जुटाता था कि मुझे राखी पर कोई उपहार दे सके एक अज़ीब कशमकश में रहता. मुझसे बात करने के लिये शब्द उसके गले तक आकर अटक जाते थे. मुझे बडी मरणांतक पीडा होती. मै समझने लगी थी कि यह जगह मेरी नहीं है अभी यह ठीक से समझकर मैं कोई फ़ैसला कर पाती एक दिन उसने मुझे अपने आफ़िस के एक एक वर्कर के साथ मुझे एक ऐसी जगह भेज दिया जहां के जीवन की मैने कभी कल्पना नहीं की थी.
मैं उत्तर प्रदेश के एक ठीक ठाक मध्यम वर्गीय परिवार की तीन भाइयों के बीच की अकेली लडकी थी. तीन भाईयों के बीच होने के कारण थोडी दुलारी नकचढी और बेहतर जिन्दगी के सपने देखने वाली और अचानक यह बेतूल जिले के चिखली ब्लाक के जन्गलों के बीच के एक गांव में फ़ील्ड के अनुभव के नाम पर काम करने लिये भेज दिया जाना................ मैं भाई के इस फ़ैसले को कई दिनों तक समझ नहीं पाई थी. मेरे लिये बेतूल जिला एक अनजान और बहुत अज़ीब सा जिला था. अपनों से दूर वीरान में सांप बिच्छुओं के बीच एक ऐसी झोपडी में जीना जहां अगल बगल सांप और चूहों के चलने की आवजें आती हों बेहद डरावना था लेकिन अपने जीवन की इन परिस्थितियों में मैने इसे अपना भाग्य मान लिया था ..........मां अक्सर बहुत याद आती. उसका लाड और दुलार याद आता.......ठोडा सा बुखार होने पर उसका चादर ओढाना, सिर में तेल लगाना .....सिरहाने बैठे रहना सब याद आता ...........पापा का संरक्षण और गुस्सा याद आता ......मेरे दोनों छोटे भाई याद आते ...पर जिन्दगी कुछ ऐसे जाल में उलझ गयी थी कि मैं उनकी आवज सुनने को तरस गयी थी .................एक रात जब पेशाब करने के लिये बाहर जाते वक्त जब एक मोटा सांप दरवाजे पर था तो जिन्दगी जैसे खत्म सी लगी ..........उस रात के बाद जितने दिन मैं वहां रही रात में सोयी नहीं ....धीरे धीरे मैने अपने को काम में रमाना शुरू किया लेकिन अक्सर मेरे दिमाग में आता भाई तो जानता था मुझे फ़िर उसने मुझे यहां क्यों भेजा ??? अक्सर इन्हीं सवालों में उलझकर मैं एक गां से दूसरे गांव के रास्ते नापती. कभी रोती, कभी अपने से सवाल करती और कभी छोटे छोटे टीलों पर बसे गां वों में रहने वालों को देखकर अपने जीवन से उनकी तुलना करती. धीरे धीरे मैने उस पूरी जमात के दुख दर्द और रहन सहन को जानना शुरू किया जो इन्हीं परिस्थितियों में पैदा होते हैं और जीते हैं ...जो इससे इतर जीवन जानते ही नहीं.......अक्सर मैं अपने जीवन से उनकी तुलना करती और मेरी पीडा धीरे धीरे कम होने लगती. ...........
Saturday, April 11, 2015
कवि उदय प्रकाश, पापुलर चेहरे और ब्राह्मणवाद ...
’ब्राह्मण’ और ’ब्राह्मणवाद अक्सर इन दो शब्दों की विशद चर्चा मेरे तमाम मित्रों द्वारा फ़ेसबुक से लेकर तमाम जगहों पर की जाती है. कई बार तो व्यक्तिगत बहसों में भी इन दोनों शब्दों को लेकर लम्बी लम्बी चर्चा यहां तक की विवाद होते रहते हैं. अभी ताज़ा विवाद फ़ेसबुक पर पढने को मिला दिव्या शुक्ला, पंकज झा और कवि उदय प्रकाश की वाल पर. यह विवाद कुछ इतना बडा हुआ कि पान्चजन्य में छपे एक लेख में कवि उदय प्रकाश को मिले साहित्य अकादमी पुरस्कार को वापस ले लेने की मांग की गयी. तो क्या इस देश में ब्राह्मणवाद इतना बडा और मजबूत तंत्र है कि इस वाद पर अपनी सोच रख देने भर से आपके जीवन की सबसे बडी उपलब्धी पर ग्रहण लग जाता है? क्या यह इतना तगडा और मजबूत तंत्र है कि यह आपकी जडें खोदने के लिये काफ़ी है ? क्या यह इतना तगडा और मजबूत तंत्र है कि यह आपको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भी जगह और अवसर नहीं देता? अगर ऐसा है तो यह बेहद गम्भीरता से सोचने और समझने वाला विषय है क्योंकि इतनी बडी आबादी वाले देश में एक छोटे से समूह का इतना तगडा नेटवर्क? इतनी बडी आबादी वाले देश में एक ऐसा समूह जिसके हाथ में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का सीधा हथियार है ? अगर ऐसा है तो सच में सोचने वाली बात है. वैसे फ़ेसबुक पर ब्राह्मणवाद की यह बहस फ़ेसबुक पर क्यों और कैसे शुरू हुई यह पता नहीं लेकिन कवि उदय प्रकाश के खिलाफ़ आगबबूला होना का कारण उनकी यह पोस्ट थी...
“इस समय, इस देश में, जो सबसे बड़ी अलगाववादी, देशद्रोही ताक़त है, वह कुछ और नहीं , ब्राह्मणवादी हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद है।
वह किसी भी 'पाप्युलर' चेहरे के साथ अवतरित हो सकता है।
यह एक ऐसा सच है, जिसे स्वीकार करना, इस देश की मुक्ति और स्वतंत्रता की दिशा में पहला ज़रूरी क़दम होगा। इसे स्वीकार करने के लिए सच्ची देशभक्ति, सामाजिक प्रतिबद्धता और साहस चाहिए।”
मैं उदय प्रकाश जी की यह पोस्ट बार बार पढने और समझने की कोशिश कर रही हूं और यह भी समझने की कोशिश कर रही हूं कि कवि उदय प्रकाश आखिर यह क्यों लिख रहे हैं ? फ़िर सोच रही हूं कि आखिर उनके लिखने में ऐसा क्या है जिसके कारण पंकज कुमार झा साहेब इतना मुखर विरोध कर रहे हैं? क्या यह एक ब्राह्मण और एक गैर ब्राह्मण की व्यक्तिगत लडाई भर है ? लेकिन इस बढते विवाद पर कुछ और टिप्पडियां भी आयीं जिसमे प्रमुख रूप से अर्चना वर्मा जी की की ८ पोस्टेंम हैं ब्राह्मण वाद पर और उसके जवाब में अरुण माहेशवरी जी की लम्बी पोस्ट. यह बडी अज़ीब बात है कि किसी की अभिव्यक्ति पर इस कदर विरोध जाहिर किया जाये कि उसे मिले सम्मान को छीन लेने की बात कर दी जाये? यह बडी अज़ीब बात है कि इस पर एक सम्पादकीय लिख दिया जाये. अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की इतनी भी जगह इस देश में नहीं ताकि हम अपनी बात एक मंच पर कह सकें. पन्कज कुमार झा के विरोध और उस अखबार के सम्पादकीय ने यह साबित तो किया ही है कि इस देश में ब्राहमणवाद है और वह एक विषेश जाति के एक समूह द्वारा ही सन्चालित किया जाता है . यह और बात है कि उस वाद में अन्य वर्ग भी शामिल हैं. ऐसा इसलिये है क्योंकि शास्त्र कहते हैं कि बिना राजसत्ता के ब्राह्मण का वर्चस्व कायम नहीं हो सकता. आईये जरा करीने से ब्राह्मण उसके वाद और राजसत्ता से उसके सम्बन्ध को समझा जाये क्योंकि इसी को उदय प्रकाश ’पापुलर चेहरा’ कह रहे हैं. इस समझ को सबके सामने रखने के लिये मैं भारत के सामाजिक ताने बाने, साहित्य और प्राचीन इतिहास का सहारा लेना चाहती हूं. इसीलिये मैं उदय प्रकाश जी के पूरे कथन को दो हिस्सों में समझना चाहती हूं. पहला ब्राह्मण और ब्राह्मण वाद और दूसरा हिस्सा पापुलर चेहरा. आईये पहले ’पापुलर चेहरे’ के सहारे की बात करें. पापुलर चेहरे की बात पहले इसलिये क्योंकि इसी के सहारे हम सत्ता, सत्ता में एक वाद के हावी होने और उसके काम करने के तरीके को आसानी से समझ सकते हैं. क्योंकि कोई भी विचारधारा शासन और सत्ता पर तभी हावी हो सकती है जब उसे किसी चेहरे के माध्यम से पर सफ़लता से पहुंचाया जासके.
पापुलर चेहरा इसका मतलब क्या है ? और इस वाद के पापुलर चेहरे के माध्यम से अवतरित होने का आश्य क्या है ? अगर हम इन दो के अन्योन्याश्रित सम्बन्ध को सही तरीके से समझें तो यह बात स्पष्ट हो जायेगी कि ब्राहमण और उसका वाद क्या है और कैसे काम करता है? कैसे वो सत्ता और सत्ता के सिंहासन तक पहुंचकर जनता के जीवन के हर काम भाव और नीति को प्रभावित करता है . कैसे वो एक घेरा बनाता है जिसमें सत्ता बंधती चली जाती है. दूसरी तरफ़ यह पूरा वाद धर्म और कर्म कांड के नाम पर आम जन के भीतर भी गहरे काम करता है जो इस जनता में दो तरह से काम करती है. नम्बर एक – यह पूरा तन्त्र जनता में एक तरह का भय पैदा करता है और दूसरा यह कि वह सत्ता के साथ जनता के भीतर कई तरह के भेद विभेद और मतभेद भी पैदा करने में सफ़ल होता है जो सत्ता के लिये एक महव्पूरण हथियार बनके ऊभरती है. दुनिया के कई देशों में समय समय पर इस तरह के उदाहरण मिलते हैं. आयातुल्ला खोमेनी इसका सबसे बडा उदाहरण है लेकिन हम यहां इसे भारतीय इतिहास और मिथकों से समझने की कोशिश करेंगे.
भारतीय इतिहास उठाकर देखें तो राजसत्ता के अनेक ऐसे पापुलर चेहरे दीखेंगे जिनका वजूद आज भी कायम है. इन पापुलर चेहरों में सबसे पापुलर चेहरा राम का है. राम ब्राह्मण नहीं थे लेकिन वह इस वाद का सबसे बडा हथियार रहे हैं और आज भी हैं. क्या इसके पीछे राम का हाथ रहा होगा कि उन्हें इस रूप में स्थापित किया जाये ? क्या उन्होंने वाल्मिकी को रामायण लिखने के लिये प्रेरित किया था ? शायद नहीं, किन्तु इस चेहरे को अनेक काल खण्डों में भारत के अलग अलग जगहों पर ना केवल ग्रन्थ लिखे. समझने वाली बात है कि क्या कथा लिखने भर से राम का चरित्र पापुलर हो गया ? शायद नहीं बल्कि इस कथा को प्रचारित और प्रसारित करने के लिये इसके पीछे एक पूरा तन्त्र था जिसने उसे उसी रूप में मूर्त करने की कोशिश की जिस रूप में उस तन्त्र ने चाहा ......मैं यहां राम का विरोध नहीं कर रही बल्कि एक पापुलर चेहरे और राजसत्ता के समीकरण को समझने की कोशिश कर रही हूं. राम के विरोध के भी कई कारण उनके ऊपर लिखित चरित्र के माध्यम से किया जा सकता है लेकिन यह अग्यात है कि राम का वास्तविक चरित्र क्या था. राम को हम उतना ही जानते और समझते हैं जितना रामायण और राम कथा से सुनते और समझते हैं. राम को लेकर यह तन्त्र और समीकरण इतना तगडा था कि आने वाले दिनो में भी राम राज ही हो ऐसी कल्पना की गयी........
इसी तरह का एक चेहरा कृष्ण का भी है. इस चेहरे के पीछे भी बहुत काम किया गया है. इस चेहरे के बचपन से लेकर हर काल की छवि का चित्रण कुछ इस तरह किया गया है और उसे देव रूप से जोड कर इस तरह प्रचारित किया गया है कि आपके विरोध के लिये कहीं जगह नहीं. इस चेहरे की बायगेमी पवित्र, इस चेहरे की रास लीला पवित्र, उसकी हर नीति पवित्र. यहां मैं कृष्ण का भी विरोध नहीं कर रही बल्कि यह समझने की कोशिश कर रही हूं कि उस पूरे तन्त्र द्वारा किसी व्यक्ति का चरित्र लिख और प्रचारित भर कर देने से पूरा मानव समाज किस तरह उसे उसी रूप में भजने और देखने लगता है जैसा वह चाहता है. इसी क्रम में बहुत से चेहरे इतिहास में बुने गये और जनता को उसे उसी रूप में भजने और देखने को बाध्य किया गया है. बहु सन्खयक जनता इस पापुलर चेहरे के मोह पाश में अक्सर बंधती भी रही.
पापुलर चेहरे के साथ अवतरित होने के क्रम में कभी कभी यह वाद ठंढा भी पडःआ और शान्त भी रहा लेकिन इसकी जडें फ़िर भी काम करती रहीं और वह अपना पापुलर चेहरा गढता रहा. यह जरूरी नहीं है कि यह पापुलर चेहरा किसी विषेश जाति या वर्ग का होगा बल्कि यह जरूरी है कि यह पापुलर चेहरा उस पूरे वाद विन्यास के साथ काम करेगा जिसके बूते सत्ता और सत्ता की रणनीति पर कायम हुआ जा सकता है.
तो अगर पन्कज कुमार झा और वह अखबार इस पूरे वक्तव्य के विरोध में लिखते और छापते हैं और यह मांग कर डालते हैं कि उन्हें दिया गया साहित्य अकादमी पुरस्कार वापस लिया जाये तो यह बात अपने आप ही सिद्ध होती है कि आज भी यह वाद एक पापुलर चेहरे के पीछे से ना केवल हावी होने की कोशिश कर रहा है बल्कि वह विन्यास गढने में लगा हुआ है ताकि सफ़ल हुआ जा सके. आगे बात ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद की
-------------------डा. अलका सिंह
Wednesday, April 24, 2013
क्या मतलब है जब अनुज कहते हैं कि 'धरती उनकी भी है '
‘अनुज कुमार’ इमानदारी से कहूं तो यह मेरे लिये एक ऐसा अनजाना नाम है जिसे मैने इस कविता को पढने से पहले पूरी तरह नहीं जाना था. अनुज मेरे अन्य फेसबुक मित्रों की तरह एक मित्र हैं और इस कविता के साथ उन्होने मेरा नाम टैग किया था. करीब दो दिनो तक काम की व्यस्तता के कारण मेरी नज़र इस कविता पर गयी ही नहीं लेकिन कल जब मैं थोडा फुर्सत से बैठी तो देखा कि एक कविता मेरी वाल पर मेरा इंतज़ार कर रही है. यह सचमुच एक ऐसी कविता थी जो बरबस मेरा ध्यान खींच रही थी. मैने कविता को एक सरसरी निगाह से देखा और चुप चाप सोचने लगी यह अनुज आखिर है कौन ? क्या काम करता है यह ? शिक्षा की किस डोर को कहां तक और कहां से पकडा है इसने. कई बार प्रोफाईल देखने की कोशिश की लेकिन नेटवर्क की खराबी के कारण पूरी प्रोफाईल खुली ही नहीं. बस अनुज का चेहरा और उसका नाम देख पा रही थी. फिर उनको मैं उनको उनकी कविता के माध्यम से समझने की कोशिश करने लगी...... आप भी पढें अनुज की एक बेहद सम्वेदंशील और बडी कविता जो वहां से बोलती है जहां से मानव ने अपना सफर शुरू किया था क्योंकिं यह कविता अपने समय से आगे भी जाती है और बहुत पीछे मिथक से लेकर इतिहास और मानव विकास के पार तक जाती है. बेहद अर्थपूर्ण यह कविता मानव समाज , उसके विकास और उसके इतिहास पर सोचने कोमजबूर करती है. प्रस्तुत है अनुज की कविता धरती उनकी भी है -----------
जिनके सर पर छत हो,
उनके लिए धरती घर होती है,
जिनके हाथ में रोटी हो,
उनके लिए धरती शहद का छत्ता होती है,
जिनके देह पर शॉल हो,
उनके लिए धरती गर्म होती है,
जिनके बगल में माशूक हो,
उनके लिए धरती रूमानी होती है,
जिनके हाथ में प्याला हो,
उनके लिए धरती सपना होती है,
धरती के लाखों रंग उनके भी होते हैं,
जिनके सर शम्बूक के हैं,
हाथ एकलव्य के और दिल कबीर का,
जो बिरसा हैं, जाबली सत्यकाम हैं,
जो मनुष्य से हैं, मनुष्य नहीं,
जिनके ज़मीं का हिस्सा किसी का बकाया है,
जिनने अपने आकाश, चाँद सूरज खातिर बहुत चुकाया है,
जिनके बगल में कोई नहीं,
केवल ये हैं, इनके मवेशी, इनका घर.
जिनकी कोई मांग नहीं, केवल जबरन माँगा है,
जिन्होंने अपना बचपन धरती को जन्नत मानने में गुज़ारा है
और अपनी जवानी आकाश तक चीखें,
और धरती के गर्भ में अपनी आहें पहुंचाने में गुजारी है,
जो आज भी दो बांह धरती के मोह में
सदियों से दधिची की हड्डिया ढूँढ रहे थे. ढूँढ रहे हैं.
__________________अनुज कुमार_____
. जैसा कि मैने पहले कहा मैं अभी तक अनुज के लेखन से बहुत परिचित नहीं हूं. थोडा थोडा याद आ रहा है कि शायद अनुज को अशोक कुमार पांडे के ब्लाग असुविधा पर पढा था. पर पक्का याद नहीं है. लेकिन अनुज की इस कविता ने मेरा अनुज से एक अलग ही परिचय कराया है. परिचय यह कि इस कवि से आगे उम्मीद बध रही है. उम्मीद् यह कि इस कवि को अपने समय को बेहतर तरीके से साहित्य में रखना होगा. मैं इस कविता को इतना महत्व इसलिये भी दे रही हूं क्योंकि इस कविता ने मानव इतिहास , उसके विकास, उसके अर्थशास्त्र का सत्य एक साथ हमारे सामने रखा है. इस कविता ने मानव समाज, उसके भाव, उसके दर्द और उसकी सम्वेदना की कई पर्तें खोली हैं. बडी इमानदारी से बताने की कोशिश की है कि हम असल में हैं क्या? हमने मानव विकास के कैसे कैसे खांचे बनाये हैं. हम्ने कैसी दुनिया गढी है. आप भी देखें उनकी कविता का पहला खण्ड ....
जिनके सर पर छत हो,
उनके लिए धरती घर होती है,
जिनके हाथ में रोटी हो,
उनके लिए धरती शहद का छत्ता होती है,
जिनके देह पर शॉल हो,
उनके लिए धरती गर्म होती है,
जिनके बगल में माशूक हो,
उनके लिए धरती रूमानी होती है,
जिनके हाथ में प्याला हो,
उनके लिए धरती सपना होती है,
सामान्य तौर पर देखा जाये तो कविता का यह खण्ड उन लोगों की बात करता है जिनके पेट भरे हैं. जिनका अपने आस पास के संसाधन पर बेहतर कब्जा है. जो अधिशेष पर अपना जीवन यापन करते हैं. जिन्होने इस दुनिया को वैसा बनाया है जैसा वो चाहते हैं. इस दुनिया को वैसा बनाया है जैसी दुनिया दिखती है.इस दुनिया को वैसा बनाया है जैसा दुनिया को दरासल कई अर्थों में होना नहीं चाहिये था. मैं बार बार अनुज के अर्थ को दुनिया के रूप में शब्द दे रही हूं जबकि अनुज इसे धरती कहते हैं. तो सोच रही हूं कि अनुज ने धरती क्योंकर कहा होगा ? क्योंकर उन्होने कहा होगा कि धरती शहद हा छत्ता है ? क्योंकर कहा होगा धरती गर्म है? और क्योंकर कहा होगा कि धरती रूमानी है ? इतने सारे सवालों का जवाब खोजते खोजते जब मैं कविता के दूसरे खण्ड में प्रवेश करती हूं मुझे धरती शब्द का अर्थ स्प्ष्ट होने लगता है. मैं मनुष्य को वहां से देखने लगती हूं जब वह धरती पर आया. वहां से देखने लगती हूं जब उसने अपने लिये धरती का अर्थ समझा और जब उसने धरती को धारण किया. इसीलिये जैसे ही कविता का दूसरा खंड आरम्भ होता है इस प्रथम खंड का अर्थ अपना विशेष रूप ग्रहण करने लगता है और कविता अपना असली अर्थ पाठकों पर छोडती है .आप देखें भी देखें कविता का दूसरा हिस्सा ...........
धरती के लाखों रंग उनके भी होते हैं,
जिनके सर शम्बूक के हैं,
हाथ एकलव्य के और दिल कबीर का,
जो बिरसा हैं, जाबली सत्यकाम हैं,
जो मनुष्य से हैं, मनुष्य नहीं,
जिनके ज़मीं का हिस्सा किसी का बकाया है,
जिनने अपने आकाश, चाँद सूरज खातिर बहुत चुकाया है,
जिनके बगल में कोई नहीं,
केवल ये हैं, इनके मवेशी, इनका घर.
जिनकी कोई मांग नहीं, केवल जबरन माँगा है,
जिन्होंने अपना बचपन धरती को जन्नत मानने में गुज़ारा है
और अपनी जवानी आकाश तक चीखें,
और धरती के गर्भ में अपनी आहें पहुंचाने में गुजारी है,
जो आज भी दो बांह धरती के मोह में
सदियों से दधिची की हड्डिया ढूँढ रहे थे. ढूँढ रहे हैं.
कविता का दूसरा खंड पढते हुए मुझे अपने वो सारे काम याद आने लगते हैं जो अपनी समाज सेवा के दौरान
मैने किये हैं. वो सारा इतिहास याद आने लगता है जिसे मैने सालों पढा और पढाया है वो सारा अर्थ शास्त्र समझ में आने लगता है जिसने दुनिया को इतना जटिल और गूढ बना दिया है. दर असल कविता का पहला हिस्सा पढते हुए मुझे मानव के विकास काल के इतिहास में मनुष्य का हर पल का संघर्ष दिखता है जहां मनुष्य अपने जीवन को शिकार युग से लेजाकर एक सुगम पठ देता है. कृषि युग में आकर अधिशेष उत्पादन, बाज़ार और फिर शान और शौकत जैसे जीवन को इज़ाद करता है. धीरे धीरे यह विकास एक शक्ल अखित्यार करने लगती है और मनुष्य अपने अपनी जलवायू के हिसाब से जीवन जीने लगता है ..मनुष्य मनुष्य को विजित करने लगता है , हराता है , कुछ विजयी होने का गर्व पालते हैं, और कुछ विजित होने का दुख सहते हैं, इस तरह मनुष्य एक पूरी दुनिया ऐसी बनाता है जिसमें मानव दो भागों में बंट जाता है एक शोषक है जिसने इस धरती के अधिकतम संसाधनों को अपना कहा, अपना बनाया और अपने लिये इस्तेमाल किया. विजयी लोगों का जीवन लिखा, जीया और अपनी आने वाली पीढियों के लिये इन संसाधनों को सहेज़ कर रखने की परम्परा बनायी. भाषा बनायी, साहित्य लिखा , इतिहास बनाया और इतिहास लिखा, इन सबसे बडा उन्होने अपने आस पास के जीवन के तरीके को इतना आकर्षक बनाया कि वही तरीका मान्य और बेहतर माना जाता रहा.
वहीं दूसरी तरफ इसी धरती के मनुष्यों का बडा वर्ग जो इस दुनिया के संसाधनों के 10 प्रतिशत हिस्सेपर अपना गुज़ारा करता आ रहा है कमी उस मानव केलिये पूर्ण मानव नहीं रहा जिसने दुनिया पर अपना एक छत्र राजय बना रखा है .........जब अनुज कहते हैं कि
धरती के लाखों रंग उनके भी होते हैं,
जिनके सर शम्बूक के हैं,
हाथ एकलव्य के और दिल कबीर का,
जो बिरसा हैं, जाबली सत्यकाम हैं,
जो मनुष्य से हैं, मनुष्य नहीं,
..........तो वह इतिहास में पीछे मुड्कर देखने कीबात करते हैं. वो यह बताने की कोशिश करते हैं कि हर इंसान जो धरती पर आया है यह धरती उनकी भी उतनी ही है जितनी अन्य की. मसलन शम्बूक की भी उतनी ही है जितनी राम की, एक्लव्य की भी उतनी ही थी जितनी अर्जुन और कृष्ण. वह राम अराज्य के सत्य की बात करते हैं वह महाभारत और उसके सत्य की बात करते हैं, वह अर्जुन के शूर वीर होने पर प्रश्न भी खडा करते हैं प्रकारांतर से ......और वह द्रोण के माध्यम से शिक्षा व्यवस्था , उसके सच , उसके एक तरफा होने की तरफ इशारा करते हैं , एक्लव्य के माध्यम से वह पूरे महाभारत काल , उसके सच और हमारे मानस में रचे बसे इतिहास को पुन: खनगालने की तरफ इशारा करते हैं .....मतलब यह कि वह दुनिया को इंसानों की उस जमात के लिये सोचने को मजबूर करते हैं जो हाशिये पर रहा है/ रहता है ............. और वह भी इसी धरती की संतान है ............वह भी अपने तरीके से इस दुनिया में जीता है और इसे अपनी अगली पीढी के लिये छोड कर चला जाता है........... इसी के बहाने वो नस्ल और नस्ल भेद की भी बात करते हैं -----.
जिनके ज़मीं का हिस्सा किसी का बकाया है,
जिनने अपने आकाश, चाँद सूरज खातिर बहुत चुकाया है,
जिनके बगल में कोई नहीं,
केवल ये हैं, इनके मवेशी, इनका घर.
जिनकी कोई मांग नहीं, केवल जबरन माँगा है,
जिन्होंने अपना बचपन धरती को जन्नत मानने में गुज़ारा है
जैसे जैसे कविता आगे बढती है वह उस बडी आबादी के जीवन, उसकी मांग और उसके तनाव को रंग देती है. कविता के इस हिस्से ने जिसमें ‘केवल ये हैं, इनके मवेशी, इनका घर.’ का उल्लेख आता है मुझे बेतुल के गोंड और कोरकू आदिवासी याद आ जाते हैं...जिनके घर आज भी ऐसे ही हैं ........ कई बार सोचती हूं कि यदि दुनिया की यह आबादी भी उस समूह की तरह दुनिया के सारे संसाधनों पर बराबरी के हक के साथ सुख भोगती तो दुनिया कैसी होती ? यदि वो भी पेट्रोल की इस दुनिया में इसका उतना ही इस्तेमाल करते जैसे सुखवादी मानव समूह/ देश कर रहा है तो दुनिया कैसी होती ? यहीं पर मुझे निर्मला पुतुल याद आती हैं जब वो प्र्शन करते हैं कि सोचो अगर तुम्हारा घर पहाडी के पार सूदूर होता तो तुम्को कैसा लगता ? तो मैं भी वहीं खडी सोचती हूं कि अगर मानव का यह बडा वर्ग जो धरती को धरती बनाये रखने के लिये जोझ रहा है वो ना होता तो ये दुनिया कैसी होती ?
और अपनी जवानी आकाश तक चीखें,
और धरती के गर्भ में अपनी आहें पहुंचाने में गुजारी है,
जो आज भी दो बांह धरती के मोह में
सदियों से दधिची की हड्डिया ढूँढ रहे थे. ढूँढ रहे हैं.
...............और फिर अनुज की अंतिम चार पंक्तियां लाज़बाब कर देती हैं ............सोचती हूं , सोचती हूं .सोचती हूं निरंतर कि यह धरती और इसपर सुख से जीने वाले ऋणी है उनके जिनके जीवन सुदूर जंगल में हैं , जो दिबरी की रौशनी में अपनी चीखें पृथवी के गर्भ में डालते हैं और जो कभी सवाल करते हैं तो उनको हमारी उन समूहों की सेना , पुलिस मौत के घाट उतारती रहती है ......................एकलव्य याद है ना आपको
जिनके सर पर छत हो,
उनके लिए धरती घर होती है,
जिनके हाथ में रोटी हो,
उनके लिए धरती शहद का छत्ता होती है,
जिनके देह पर शॉल हो,
उनके लिए धरती गर्म होती है,
जिनके बगल में माशूक हो,
उनके लिए धरती रूमानी होती है,
जिनके हाथ में प्याला हो,
उनके लिए धरती सपना होती है,
धरती के लाखों रंग उनके भी होते हैं,
जिनके सर शम्बूक के हैं,
हाथ एकलव्य के और दिल कबीर का,
जो बिरसा हैं, जाबली सत्यकाम हैं,
जो मनुष्य से हैं, मनुष्य नहीं,
जिनके ज़मीं का हिस्सा किसी का बकाया है,
जिनने अपने आकाश, चाँद सूरज खातिर बहुत चुकाया है,
जिनके बगल में कोई नहीं,
केवल ये हैं, इनके मवेशी, इनका घर.
जिनकी कोई मांग नहीं, केवल जबरन माँगा है,
जिन्होंने अपना बचपन धरती को जन्नत मानने में गुज़ारा है
और अपनी जवानी आकाश तक चीखें,
और धरती के गर्भ में अपनी आहें पहुंचाने में गुजारी है,
जो आज भी दो बांह धरती के मोह में
सदियों से दधिची की हड्डिया ढूँढ रहे थे. ढूँढ रहे हैं.
__________________अनुज कुमार_____
. जैसा कि मैने पहले कहा मैं अभी तक अनुज के लेखन से बहुत परिचित नहीं हूं. थोडा थोडा याद आ रहा है कि शायद अनुज को अशोक कुमार पांडे के ब्लाग असुविधा पर पढा था. पर पक्का याद नहीं है. लेकिन अनुज की इस कविता ने मेरा अनुज से एक अलग ही परिचय कराया है. परिचय यह कि इस कवि से आगे उम्मीद बध रही है. उम्मीद् यह कि इस कवि को अपने समय को बेहतर तरीके से साहित्य में रखना होगा. मैं इस कविता को इतना महत्व इसलिये भी दे रही हूं क्योंकि इस कविता ने मानव इतिहास , उसके विकास, उसके अर्थशास्त्र का सत्य एक साथ हमारे सामने रखा है. इस कविता ने मानव समाज, उसके भाव, उसके दर्द और उसकी सम्वेदना की कई पर्तें खोली हैं. बडी इमानदारी से बताने की कोशिश की है कि हम असल में हैं क्या? हमने मानव विकास के कैसे कैसे खांचे बनाये हैं. हम्ने कैसी दुनिया गढी है. आप भी देखें उनकी कविता का पहला खण्ड ....
जिनके सर पर छत हो,
उनके लिए धरती घर होती है,
जिनके हाथ में रोटी हो,
उनके लिए धरती शहद का छत्ता होती है,
जिनके देह पर शॉल हो,
उनके लिए धरती गर्म होती है,
जिनके बगल में माशूक हो,
उनके लिए धरती रूमानी होती है,
जिनके हाथ में प्याला हो,
उनके लिए धरती सपना होती है,
सामान्य तौर पर देखा जाये तो कविता का यह खण्ड उन लोगों की बात करता है जिनके पेट भरे हैं. जिनका अपने आस पास के संसाधन पर बेहतर कब्जा है. जो अधिशेष पर अपना जीवन यापन करते हैं. जिन्होने इस दुनिया को वैसा बनाया है जैसा वो चाहते हैं. इस दुनिया को वैसा बनाया है जैसी दुनिया दिखती है.इस दुनिया को वैसा बनाया है जैसा दुनिया को दरासल कई अर्थों में होना नहीं चाहिये था. मैं बार बार अनुज के अर्थ को दुनिया के रूप में शब्द दे रही हूं जबकि अनुज इसे धरती कहते हैं. तो सोच रही हूं कि अनुज ने धरती क्योंकर कहा होगा ? क्योंकर उन्होने कहा होगा कि धरती शहद हा छत्ता है ? क्योंकर कहा होगा धरती गर्म है? और क्योंकर कहा होगा कि धरती रूमानी है ? इतने सारे सवालों का जवाब खोजते खोजते जब मैं कविता के दूसरे खण्ड में प्रवेश करती हूं मुझे धरती शब्द का अर्थ स्प्ष्ट होने लगता है. मैं मनुष्य को वहां से देखने लगती हूं जब वह धरती पर आया. वहां से देखने लगती हूं जब उसने अपने लिये धरती का अर्थ समझा और जब उसने धरती को धारण किया. इसीलिये जैसे ही कविता का दूसरा खंड आरम्भ होता है इस प्रथम खंड का अर्थ अपना विशेष रूप ग्रहण करने लगता है और कविता अपना असली अर्थ पाठकों पर छोडती है .आप देखें भी देखें कविता का दूसरा हिस्सा ...........
धरती के लाखों रंग उनके भी होते हैं,
जिनके सर शम्बूक के हैं,
हाथ एकलव्य के और दिल कबीर का,
जो बिरसा हैं, जाबली सत्यकाम हैं,
जो मनुष्य से हैं, मनुष्य नहीं,
जिनके ज़मीं का हिस्सा किसी का बकाया है,
जिनने अपने आकाश, चाँद सूरज खातिर बहुत चुकाया है,
जिनके बगल में कोई नहीं,
केवल ये हैं, इनके मवेशी, इनका घर.
जिनकी कोई मांग नहीं, केवल जबरन माँगा है,
जिन्होंने अपना बचपन धरती को जन्नत मानने में गुज़ारा है
और अपनी जवानी आकाश तक चीखें,
और धरती के गर्भ में अपनी आहें पहुंचाने में गुजारी है,
जो आज भी दो बांह धरती के मोह में
सदियों से दधिची की हड्डिया ढूँढ रहे थे. ढूँढ रहे हैं.
कविता का दूसरा खंड पढते हुए मुझे अपने वो सारे काम याद आने लगते हैं जो अपनी समाज सेवा के दौरान
मैने किये हैं. वो सारा इतिहास याद आने लगता है जिसे मैने सालों पढा और पढाया है वो सारा अर्थ शास्त्र समझ में आने लगता है जिसने दुनिया को इतना जटिल और गूढ बना दिया है. दर असल कविता का पहला हिस्सा पढते हुए मुझे मानव के विकास काल के इतिहास में मनुष्य का हर पल का संघर्ष दिखता है जहां मनुष्य अपने जीवन को शिकार युग से लेजाकर एक सुगम पठ देता है. कृषि युग में आकर अधिशेष उत्पादन, बाज़ार और फिर शान और शौकत जैसे जीवन को इज़ाद करता है. धीरे धीरे यह विकास एक शक्ल अखित्यार करने लगती है और मनुष्य अपने अपनी जलवायू के हिसाब से जीवन जीने लगता है ..मनुष्य मनुष्य को विजित करने लगता है , हराता है , कुछ विजयी होने का गर्व पालते हैं, और कुछ विजित होने का दुख सहते हैं, इस तरह मनुष्य एक पूरी दुनिया ऐसी बनाता है जिसमें मानव दो भागों में बंट जाता है एक शोषक है जिसने इस धरती के अधिकतम संसाधनों को अपना कहा, अपना बनाया और अपने लिये इस्तेमाल किया. विजयी लोगों का जीवन लिखा, जीया और अपनी आने वाली पीढियों के लिये इन संसाधनों को सहेज़ कर रखने की परम्परा बनायी. भाषा बनायी, साहित्य लिखा , इतिहास बनाया और इतिहास लिखा, इन सबसे बडा उन्होने अपने आस पास के जीवन के तरीके को इतना आकर्षक बनाया कि वही तरीका मान्य और बेहतर माना जाता रहा.
वहीं दूसरी तरफ इसी धरती के मनुष्यों का बडा वर्ग जो इस दुनिया के संसाधनों के 10 प्रतिशत हिस्सेपर अपना गुज़ारा करता आ रहा है कमी उस मानव केलिये पूर्ण मानव नहीं रहा जिसने दुनिया पर अपना एक छत्र राजय बना रखा है .........जब अनुज कहते हैं कि
धरती के लाखों रंग उनके भी होते हैं,
जिनके सर शम्बूक के हैं,
हाथ एकलव्य के और दिल कबीर का,
जो बिरसा हैं, जाबली सत्यकाम हैं,
जो मनुष्य से हैं, मनुष्य नहीं,
..........तो वह इतिहास में पीछे मुड्कर देखने कीबात करते हैं. वो यह बताने की कोशिश करते हैं कि हर इंसान जो धरती पर आया है यह धरती उनकी भी उतनी ही है जितनी अन्य की. मसलन शम्बूक की भी उतनी ही है जितनी राम की, एक्लव्य की भी उतनी ही थी जितनी अर्जुन और कृष्ण. वह राम अराज्य के सत्य की बात करते हैं वह महाभारत और उसके सत्य की बात करते हैं, वह अर्जुन के शूर वीर होने पर प्रश्न भी खडा करते हैं प्रकारांतर से ......और वह द्रोण के माध्यम से शिक्षा व्यवस्था , उसके सच , उसके एक तरफा होने की तरफ इशारा करते हैं , एक्लव्य के माध्यम से वह पूरे महाभारत काल , उसके सच और हमारे मानस में रचे बसे इतिहास को पुन: खनगालने की तरफ इशारा करते हैं .....मतलब यह कि वह दुनिया को इंसानों की उस जमात के लिये सोचने को मजबूर करते हैं जो हाशिये पर रहा है/ रहता है ............. और वह भी इसी धरती की संतान है ............वह भी अपने तरीके से इस दुनिया में जीता है और इसे अपनी अगली पीढी के लिये छोड कर चला जाता है........... इसी के बहाने वो नस्ल और नस्ल भेद की भी बात करते हैं -----.
जिनके ज़मीं का हिस्सा किसी का बकाया है,
जिनने अपने आकाश, चाँद सूरज खातिर बहुत चुकाया है,
जिनके बगल में कोई नहीं,
केवल ये हैं, इनके मवेशी, इनका घर.
जिनकी कोई मांग नहीं, केवल जबरन माँगा है,
जिन्होंने अपना बचपन धरती को जन्नत मानने में गुज़ारा है
जैसे जैसे कविता आगे बढती है वह उस बडी आबादी के जीवन, उसकी मांग और उसके तनाव को रंग देती है. कविता के इस हिस्से ने जिसमें ‘केवल ये हैं, इनके मवेशी, इनका घर.’ का उल्लेख आता है मुझे बेतुल के गोंड और कोरकू आदिवासी याद आ जाते हैं...जिनके घर आज भी ऐसे ही हैं ........ कई बार सोचती हूं कि यदि दुनिया की यह आबादी भी उस समूह की तरह दुनिया के सारे संसाधनों पर बराबरी के हक के साथ सुख भोगती तो दुनिया कैसी होती ? यदि वो भी पेट्रोल की इस दुनिया में इसका उतना ही इस्तेमाल करते जैसे सुखवादी मानव समूह/ देश कर रहा है तो दुनिया कैसी होती ? यहीं पर मुझे निर्मला पुतुल याद आती हैं जब वो प्र्शन करते हैं कि सोचो अगर तुम्हारा घर पहाडी के पार सूदूर होता तो तुम्को कैसा लगता ? तो मैं भी वहीं खडी सोचती हूं कि अगर मानव का यह बडा वर्ग जो धरती को धरती बनाये रखने के लिये जोझ रहा है वो ना होता तो ये दुनिया कैसी होती ?
और अपनी जवानी आकाश तक चीखें,
और धरती के गर्भ में अपनी आहें पहुंचाने में गुजारी है,
जो आज भी दो बांह धरती के मोह में
सदियों से दधिची की हड्डिया ढूँढ रहे थे. ढूँढ रहे हैं.
...............और फिर अनुज की अंतिम चार पंक्तियां लाज़बाब कर देती हैं ............सोचती हूं , सोचती हूं .सोचती हूं निरंतर कि यह धरती और इसपर सुख से जीने वाले ऋणी है उनके जिनके जीवन सुदूर जंगल में हैं , जो दिबरी की रौशनी में अपनी चीखें पृथवी के गर्भ में डालते हैं और जो कभी सवाल करते हैं तो उनको हमारी उन समूहों की सेना , पुलिस मौत के घाट उतारती रहती है ......................एकलव्य याद है ना आपको
Tuesday, April 23, 2013
मेरे बचपन के दिन
यह हवेली जिसे मैं बार बार महल कह रही हूं गांव से हटकर तमाम बस्ती से दूर बनाया गया एक आलीशान मकान था. हलांकि मकान आधा अधूरा ही बना था लेकिन इसकी रौनक , बनावट और शान देखने लायक थी.मेरे बचपन तक इस हवेली को गांव के लोग बडका कोठा या दरबार कहकर बुलाते थे. इस दरबार के अंतिम दिनों की मैं भी साक्षी रही हूं. इस दरबार यानि बडका कोठा की भी अपनी बडी रोचक कहानी है ..... नानी बताती थीं कि इस कोठा से पहले यहां एक दूसरा महल हुआ करता था जो 1934 के भूकम्प में जमीदोज़ हो गया. 1934 का भूकम्प बिहार् के इतिहास की एक बडी घटना है. 8.1 की तीव्रता का यह भूकम्प 15 जनवरी 1934 में आया था. हलांकि इस भूकम्प से नेपाल, मुम्बई आसाम , कोलकाता , मुम्बई यहां तक कि लहासा तक प्रभावित थे. इस भूकम्प की कहानी मैने अपने सभी बुजुर्गों से सुन रखी है. बिहार में मुंगेर और मुजफ्फर पुर पूरी तर्ह तबाह हो गये थे.
इस घटना का गवाह मेरे ननिहाल का यह छोटा सा गांव अमनौर भी था क्योंकि यह मुजफ्फरपुर के बेहद करीब है. नानी गाहे बगाहे इस भूकम्प का आंखो देखा हाल सुना दिया करती थी हम बच्चों को क्योंकि यह उसके जीवन में किशोर वय की घटी सबसे भयानक और दिल दहला देने वाली घटना थी . इस घटना ने उसके जीवन पर खासा असर डाला था. नानी कोई 12 साल की किशोरी थी जब यह भूकम्प आया था. वह बताती थीं कि ‘’ वह जाडे के दिन थे , जनवरी का महीना, कडाके की ठंढ .....अचानक धरती हिलने लगी . कोई समझ ही नहीं पाया कि ये क्या हो रहा है . ऐसा लग रहा था कि सारा गांव झूला झूल रहा हो.......... अचानक्क लोगों ने चिल्लाना शुरू किया ...भूकम आयेल बा , भूकम्प ...........बाहर निकल लोगन ..............जल्दी ............. उस समय नानी अमनौर के जिस आलीशान मकान में रहा करती थीं उसे लाल महल कहते थे. यह महल अचानक हिलने लगा और थोडी ही देर में ढहने लगा......सब तरफ धूल ही धूल ........चिल्लाहट........बचाओ बचाओ की आवाज़ ........... आज़ीब दृष्य था ...........वो कहती थी ............इस भाग दौड में घर के सभी लोग बाहर निकल गये ........... नौकर चाकर सब लेकिन उस महल में एक 6 महीने की बच्ची की रोने की आवाज़ आने लगी ..........अचानक नानी देखा कि उनकी छोटी बहन को तो कोई लेकर ही नहीं आया ........................ इस छोटी बहन का मोह नानी को इतना था कि वो भूकम्प में गिरते ढहते महल में घुस गयीं और अपनी छोटी बहन को लेकर ही लौटीं..........................वो कहती थीं .........जैसे ही मैं लल्ली को लेकर बाहर आयी महल ऐसे गिरा जैसे कभी उसका कोई नामो निशान ही ना रहा हो वहां ......................
जब भी भूकम्प का जिकर होता नानी की आंखों में एक अज़ीब सा भाव देखती मैं. उस भाव में बहुत सी कहानियां होतीं ....एक अज़ीब सा दर्द और ढेर सारे किस्से............ उनके होठ थरथराने लगते थे ..... होठ कांपने लगते थे और आंखों में एक भय भी उभर आता था ............वो कहती थी ...........भूकम्प के जाने के बाद जैसे पूरे गांव में मौत का सन्नाटा पसरा हुआ था. लोग एक दूसरे को खोज रहे थे. कुछ मकान के नीचे दब गये थे. कुछ जमीन की बडी बडी दरारों के बीच दब गये थे ...........जो बच गये थे वो रहने, खाने और अपने को बचाने का ठिकाना खोज रहे थे.............. कितने ही बच्चे , बूढे, महिलायें किसी को मिली ही नहीं .............सब तरफ अज़ीब तरह का मातम पसरा था. बच जाने की खुशी से ज्यादा लोगों को खोने का गम था .................. और मैं अपनी छोटी बहन को गोद में ले सोच रही थी कि अब हम रहेंगे कहां ? खायेंगे क्या ? सोयेंगे कहां ?
अपने बारे में सोचते सोचते जब मैं आस पास देखती तो मुझसे भी बदतर हालत में पडे लोग थे, कोई जखमी था तो किसी बच्चे की मां नहीं थी ...............ऐसा मरघट किसी ने देखा नहीं होगा जैसा उस भूकम्प के बाद लोगों ने देखा था ................
इस घटना का गवाह मेरे ननिहाल का यह छोटा सा गांव अमनौर भी था क्योंकि यह मुजफ्फरपुर के बेहद करीब है. नानी गाहे बगाहे इस भूकम्प का आंखो देखा हाल सुना दिया करती थी हम बच्चों को क्योंकि यह उसके जीवन में किशोर वय की घटी सबसे भयानक और दिल दहला देने वाली घटना थी . इस घटना ने उसके जीवन पर खासा असर डाला था. नानी कोई 12 साल की किशोरी थी जब यह भूकम्प आया था. वह बताती थीं कि ‘’ वह जाडे के दिन थे , जनवरी का महीना, कडाके की ठंढ .....अचानक धरती हिलने लगी . कोई समझ ही नहीं पाया कि ये क्या हो रहा है . ऐसा लग रहा था कि सारा गांव झूला झूल रहा हो.......... अचानक्क लोगों ने चिल्लाना शुरू किया ...भूकम आयेल बा , भूकम्प ...........बाहर निकल लोगन ..............जल्दी ............. उस समय नानी अमनौर के जिस आलीशान मकान में रहा करती थीं उसे लाल महल कहते थे. यह महल अचानक हिलने लगा और थोडी ही देर में ढहने लगा......सब तरफ धूल ही धूल ........चिल्लाहट........बचाओ बचाओ की आवाज़ ........... आज़ीब दृष्य था ...........वो कहती थी ............इस भाग दौड में घर के सभी लोग बाहर निकल गये ........... नौकर चाकर सब लेकिन उस महल में एक 6 महीने की बच्ची की रोने की आवाज़ आने लगी ..........अचानक नानी देखा कि उनकी छोटी बहन को तो कोई लेकर ही नहीं आया ........................ इस छोटी बहन का मोह नानी को इतना था कि वो भूकम्प में गिरते ढहते महल में घुस गयीं और अपनी छोटी बहन को लेकर ही लौटीं..........................वो कहती थीं .........जैसे ही मैं लल्ली को लेकर बाहर आयी महल ऐसे गिरा जैसे कभी उसका कोई नामो निशान ही ना रहा हो वहां ......................
जब भी भूकम्प का जिकर होता नानी की आंखों में एक अज़ीब सा भाव देखती मैं. उस भाव में बहुत सी कहानियां होतीं ....एक अज़ीब सा दर्द और ढेर सारे किस्से............ उनके होठ थरथराने लगते थे ..... होठ कांपने लगते थे और आंखों में एक भय भी उभर आता था ............वो कहती थी ...........भूकम्प के जाने के बाद जैसे पूरे गांव में मौत का सन्नाटा पसरा हुआ था. लोग एक दूसरे को खोज रहे थे. कुछ मकान के नीचे दब गये थे. कुछ जमीन की बडी बडी दरारों के बीच दब गये थे ...........जो बच गये थे वो रहने, खाने और अपने को बचाने का ठिकाना खोज रहे थे.............. कितने ही बच्चे , बूढे, महिलायें किसी को मिली ही नहीं .............सब तरफ अज़ीब तरह का मातम पसरा था. बच जाने की खुशी से ज्यादा लोगों को खोने का गम था .................. और मैं अपनी छोटी बहन को गोद में ले सोच रही थी कि अब हम रहेंगे कहां ? खायेंगे क्या ? सोयेंगे कहां ?
अपने बारे में सोचते सोचते जब मैं आस पास देखती तो मुझसे भी बदतर हालत में पडे लोग थे, कोई जखमी था तो किसी बच्चे की मां नहीं थी ...............ऐसा मरघट किसी ने देखा नहीं होगा जैसा उस भूकम्प के बाद लोगों ने देखा था ................
Monday, April 15, 2013
जब जब सोचती हूं तुम्हें
तुम्हें सोचती हूं
जब जब
याद करती हूं
वक्त खुद ही उकेरने लगता है
बीता हुआ कल
एक अक्स ,कुछ शब्द
पीछे मुडकर
जब जब तुम्हे देखती हूं
एक परछाई की पदचाप
उभरने लगती है
मैं सुनने की कोशिश करती हू उसे
ठिठक जाती हूं
बीती हुई आहटों के साथ
जब जब
लिखती हूं तुम्हें
तुम पहाड बन जाते हो
एक किताब
जिसके पन्ने पलटने से
सिहरन होती है
खुशी और भय दोनों
मैने तुम्हें और उस वक्त को
अपनी किताबों में
बन्द कर रखा है
तब से
इतने सावल जो करने हैं तुमसे
पूछना है
अक्षर अक्षर बीता हुआ कल
मन
सुनना चाहता है तुमको
अपने लिये
.......................................अलका
जब जब
याद करती हूं
वक्त खुद ही उकेरने लगता है
बीता हुआ कल
एक अक्स ,कुछ शब्द
पीछे मुडकर
जब जब तुम्हे देखती हूं
एक परछाई की पदचाप
उभरने लगती है
मैं सुनने की कोशिश करती हू उसे
ठिठक जाती हूं
बीती हुई आहटों के साथ
जब जब
लिखती हूं तुम्हें
तुम पहाड बन जाते हो
एक किताब
जिसके पन्ने पलटने से
सिहरन होती है
खुशी और भय दोनों
मैने तुम्हें और उस वक्त को
अपनी किताबों में
बन्द कर रखा है
तब से
इतने सावल जो करने हैं तुमसे
पूछना है
अक्षर अक्षर बीता हुआ कल
मन
सुनना चाहता है तुमको
अपने लिये
.......................................अलका
Thursday, April 11, 2013
मेरे बचपन के दिन
सामंती व्यवस्था वाले इस गांव का पन्ना मेरी स्मृतियों में हमेशा कुछ इसी तरह की ही घटनाओं से खुलता है. कभी बचपन के दोस्त, कभी नानी, कभी अन्यों के साथ बनते – बिगडते रिश्तों और उसके अहसासों के पन्ने लिये जहन में तैरता रहता है.., मैं इन पन्नों को इस समय पकड की कवायद कर रही हूं......क्योंकि सामंती व्यवस्था वाले इस गांव , इस घर और यहां के लोगों के साथ मेरा जो आत्मीय रिश्ता था वह करीब होते हुए मेरे मस्तिष्क को सवाल करने के लिये मजबूर करता था ....................जैसे जैसे मेरी समझ विकसित होती गयी मैं इस घर के लोगों के साथ के अलग अलग रिश्तों के अर्थ को समझने के लिये दिमाग पर जोर देने लगी. उसी घर की एक बूडी इस घर को अपने पुरखों का पुरुषार्थ बताते हुए बखान करती और उसी घर से जुडे कई अन्य इस घर और हवेली को अपने लिये रोजगार की जगह बताते. मैं उनके वक्तव्यों, उसके मर्म और उसके अंतर को तब समझने में असमर्थ थी... लेकिन इतनी जरूर था कि मैं इन सभी को रेखांकित कर मां से इसका अर्थ पूछने से बाज नहीं आती थी ......... मां मुझे छोटी बच्ची समझ मेरे सवालों को शायद नज़रन्दाज़ कर देती ...या फिर मेरे छोटे दिमाग में बडी बातों का बोझ डालने से बचती थी.
इस गांव और इस हवेली से जुडे रिश्तों का बखान करते हुए नानी इसका एक गौरवशाली इतिहास बताती थी. उसके अनुसार मिर्जापुर जिले के रहने वाले दो सिपाहियों परस राय और परशुराम राय ने इस गांव को बसाया था. दोनो शिवाजी की सेना के बहुत बहादुर सिपाही थे. इन दोनो में से किसी एक को पूर्व के काला देव की उपाधि दी थी शिवा जी ने. सेना से निवृत्ति के बाद दोनो ने अपना राज्य स्थापित करने की इच्छा से बिहार के इस इलाके की तरफ आये. यहां आकर उनके मन को इतना सुकून मिला कि उन्होने इसका नाम अमन –उर यानि अमनौर् रख दिया और यहीं बस गये.
सही मायनों में देखा जाये तो यह इलाका प्राकृतिक रूप से बेहद खूब सूरत है. आम, लीची, जामुन , ताड और खज़ूर के पेडों और तमाम अन्य वनस्पतियों से लदा यह इलाका मन को बहुत आकर्षित करता है. वैसे भी आप जब उत्तर प्रदेश का बलिया जिला पार कर माझी के पुल पर पहुंचते हैं तो एक अलग ही अह्सास से भर उठते हैं और अमनौर तक पहुंचते पहुंचते यह अह्सास और भी अधिक घनीभूत हो जाता है.
इस राज्य और इसके इतिहास से जुडे कुछ साक्ष्य और किंवदंतियां भी हैं जिसे वहां पर रहने वाली एक खास जाति जिसे पवंरिया कहते हैं उनके पास सुरक्षित है. पवंरिया चारण और भांट टाईप की तरफ की एक जाति है जो कई अवसरों पर इस राज्य का गुङान करती है. जिसे पवांरा कहते हैं. वह इतिहास की इन सारी कथाओं को गा गा कर सुनाते हैं ( अब वह ऐसा करते हैं कि नहीं पता नहीं) मेरे बचपन तक यह परम्परा कायम थी और यह ही उनका रोजगार था. मैने अपने बचपन में अपने छोटे भाई के जन्म पर यह पंवारा देखा और सुना था...... अभी भी इसकी एक लाईन याद है जिसे अक्सर हम परिहास में गाते हैं कि ................महराज घर में बेटा भयेल बा शुभे लगना. ................इस गांव में कई ऐसी जगहें हैं जिसे यहां के राजपूत यहां के इतिहास के साक्षय के रूप में जोड्कर देखते हैं जो इन पवंरिया लोगों की कथाओं में भी सुरक्षित थे.
जैसा कि अक्सर इस तरह की किम्वदंतियों से जुडे गांव में होता है वैसे ही यहां भी गांव की बसाहट में था. गांव में अधिकत्र परिवार कर्मवार क्षत्रियों का है. इनके अनुसार उन्होने अन्य जातियों को प्रजा के रूप में बसाया है. इस तरह गांव की बसाहट में कुर्मी, यादव, ब्रहमन, माझी, दुसाध, मेहतर, लोहार, धोबी, तमोली, तेली, कानू, जायसवाल जैसी जितनी भी जातियां होती हैं सब थीं. मेरे बचपन तक यह सभी जातियां अपने अपने परम्परागत घन्धे के साथ जुडकर काम करती थीं. इन सभी जातियों के लिये यह हवेली दिन भर के रोजगार के लिये एक महतव्पूर्ण जगह थी.
इस गांव और इस हवेली से जुडे रिश्तों का बखान करते हुए नानी इसका एक गौरवशाली इतिहास बताती थी. उसके अनुसार मिर्जापुर जिले के रहने वाले दो सिपाहियों परस राय और परशुराम राय ने इस गांव को बसाया था. दोनो शिवाजी की सेना के बहुत बहादुर सिपाही थे. इन दोनो में से किसी एक को पूर्व के काला देव की उपाधि दी थी शिवा जी ने. सेना से निवृत्ति के बाद दोनो ने अपना राज्य स्थापित करने की इच्छा से बिहार के इस इलाके की तरफ आये. यहां आकर उनके मन को इतना सुकून मिला कि उन्होने इसका नाम अमन –उर यानि अमनौर् रख दिया और यहीं बस गये.
सही मायनों में देखा जाये तो यह इलाका प्राकृतिक रूप से बेहद खूब सूरत है. आम, लीची, जामुन , ताड और खज़ूर के पेडों और तमाम अन्य वनस्पतियों से लदा यह इलाका मन को बहुत आकर्षित करता है. वैसे भी आप जब उत्तर प्रदेश का बलिया जिला पार कर माझी के पुल पर पहुंचते हैं तो एक अलग ही अह्सास से भर उठते हैं और अमनौर तक पहुंचते पहुंचते यह अह्सास और भी अधिक घनीभूत हो जाता है.
इस राज्य और इसके इतिहास से जुडे कुछ साक्ष्य और किंवदंतियां भी हैं जिसे वहां पर रहने वाली एक खास जाति जिसे पवंरिया कहते हैं उनके पास सुरक्षित है. पवंरिया चारण और भांट टाईप की तरफ की एक जाति है जो कई अवसरों पर इस राज्य का गुङान करती है. जिसे पवांरा कहते हैं. वह इतिहास की इन सारी कथाओं को गा गा कर सुनाते हैं ( अब वह ऐसा करते हैं कि नहीं पता नहीं) मेरे बचपन तक यह परम्परा कायम थी और यह ही उनका रोजगार था. मैने अपने बचपन में अपने छोटे भाई के जन्म पर यह पंवारा देखा और सुना था...... अभी भी इसकी एक लाईन याद है जिसे अक्सर हम परिहास में गाते हैं कि ................महराज घर में बेटा भयेल बा शुभे लगना. ................इस गांव में कई ऐसी जगहें हैं जिसे यहां के राजपूत यहां के इतिहास के साक्षय के रूप में जोड्कर देखते हैं जो इन पवंरिया लोगों की कथाओं में भी सुरक्षित थे.
जैसा कि अक्सर इस तरह की किम्वदंतियों से जुडे गांव में होता है वैसे ही यहां भी गांव की बसाहट में था. गांव में अधिकत्र परिवार कर्मवार क्षत्रियों का है. इनके अनुसार उन्होने अन्य जातियों को प्रजा के रूप में बसाया है. इस तरह गांव की बसाहट में कुर्मी, यादव, ब्रहमन, माझी, दुसाध, मेहतर, लोहार, धोबी, तमोली, तेली, कानू, जायसवाल जैसी जितनी भी जातियां होती हैं सब थीं. मेरे बचपन तक यह सभी जातियां अपने अपने परम्परागत घन्धे के साथ जुडकर काम करती थीं. इन सभी जातियों के लिये यह हवेली दिन भर के रोजगार के लिये एक महतव्पूर्ण जगह थी.
Monday, April 8, 2013
मेरे बचपन के दिन
अब मुझे सज़ा मिलने वाली थी .............सज़ा ......एक कडी सज़ा ......... मेरे अन्दर अज़ीब अज़ीब भाव आ रहे थे. डर भी लग रहा था और समझ में भी नहीं आ रहा था कि घर पर क्या होगा. 5-6 साल के बच्चे का मन दुनिया को समझने की जुगत में लगा रहता है. यह जानने की कोशिश में लगा रहता है कि इस दुनिया में उसके कौन सी हरकत मान्य है और कौन सी अमान्य.
मैं कई तरह के बाल उहा- पोह में थी कि मेरी इस गलती के लिये नानी की सज़ा क्या होगी मेरे लिये ? सच कहूं तो मुझे अपनी ये गलती गलती लग ही नहीं रही थी क्योंकि आज़मगढ में तो अक्सर मैं ऐसा करती थी और मां मुझे कोई सज़ा नहीं देती थी. उल्टे सवाल करती थी, आज क्या क्या खेला? कहां कहां गयी? किस किस दोस्त के साथ खेला? वगैरह वगैरह ...... मैं सोच रही थी जीजी डांटेंगी या फिर् मेरी मां से शिकायत करेंगी, या फिर रात का खाना बन्द करने की धमकी देंगी जैसा कि वो अक्सर करती थीं.......... यही सब सोचते सोचते मैं दुरूखे पर आ गयी थी और उस व्यक्ति ने मेरी बांह जो उपर से पकड र्खी थी छोड्कर अब कलाई पकड ली थी और मेरी तरफ अज़ीब भाव से देखते हुए कहा ...... अब घरे आ गयीनी नूं जाईं अब बबुई जी के दरबार में ..... मैं उसकी बात सुन उसे पलट कर देखते हुए आगे बढ ही रही थी कि मेरी घिग्घी बन्ध गयी.........जैसे शेर के सामने मेमेना ...... रास्ते भर मिलीं सारी की सारी घमकियां एक एक करके आंखों के आगे आ गयीं. नानी से मेरी इतनी अधिक मानसिक दूरी थी कि मैं उनसे कुछ कह पाने में सह्ज़ नहीं थी दूसरे मेरे अन्दर एक तरह का बाल स्वाभिमान (ईगो) भी था. मैं बस आंख नीची किये उनके सामने खडी रही ......कोई पांच मिनट भी नहीं बीते होंगे कि सज़ा सुना दी गयी ..........भंडारी को यह हुक्म दे दिया गया कि मुझे घर के भंडार घर में बन्द कर दिया जाये...........और मैं उस घर में बन्द कर दी गयी. घर के अन्य किसी सदस्य ने इसका कोई विरोध भी नहीं किया. यहां तक की मां ने भी नहीं.
मेरा बच्चा मन जिस लोक राग में रमा लगा बाज़ार तक चला गया था वह मुझ बच्चे को ही नहीं नानी के कानों को भी खूब भाता था. मैने अक्सर उन्हें भगत लोगों को रोककर देवी गीत सुनते देखा था. प्रशंसा करते देखा था तो फिर सज़ा किस बात की थी यह समझ्ने के लिये नानी ने मुझे खासा वक्त दिया था.
मैं भंडार घर में बन्द कर दी गयी थी. भंडार घर का माहौल मेरे जैसे बच्चे को डराने के लिये काफी था. बडे बडे बोलो में भरे मकई, चावल, दाल, चना, तेल , सरसों, तीसी और भी तरह के दूसरे सामान..............कमरे में बन्द होने के बाद मेरा खूराफाती दिमाग यह सोचने में लगा था कि यहां बितने वाला वक्त आखिर कैसे काटूंगी........ यह सोचने में भी लगा था कि आखिर कब तक बन्द रहूंगी.........सारे बच्चे ऐसे ड्अरे सहमें थे कि कोई दरवाजे तक आने की हिम्मत नहीं कर रहा था .................और मैं सोच रही थी कि क्या करूं अब ?
मैने उस कमरे की उंची ऊंची खिडकियों की तरफ देखा और उसी पर जाकर बैठ गयी..इस जुगत में कि अगर चट्खनी खुल गयी तो मैं यहां से ही निकल भागूंगी लेकिन वो इतनी ऊंची थीं कि मेरे बस की नहीं थीं ..........फिर भी मैं कोशिश कर रही थी ............ बीच बीच में चूहों की ची ची से मैं सिहर जाया करती थी .............और मां का इंतजार करने लगती थी .......................... अचानक मेरे गुस्से ने अपना काम करना शूरू किया और फिर मैने हनुमान जी की तरह उस घर में रखे कई बोरों को नुकसान पहुंचाया .........सरसों का तेल गिराया..............उसपर तरह तरह के सामान को गिराया जो भी हाथ में मिला उससे बोरियां फाड डालीं फिर सब्से उंचे बोरे पर चढ कर बैठ गयी ........................ कोई दो तीन घंटे बाद दरवाज़ा खुला ............... और मुझे बाहर निकाला गया .....................
इस घटना ने मुझे कई नसीहतें दी थीं......... इस घर के तौर तरीकों और कानून कायदों का अहसास कराया था .............
मैं कई तरह के बाल उहा- पोह में थी कि मेरी इस गलती के लिये नानी की सज़ा क्या होगी मेरे लिये ? सच कहूं तो मुझे अपनी ये गलती गलती लग ही नहीं रही थी क्योंकि आज़मगढ में तो अक्सर मैं ऐसा करती थी और मां मुझे कोई सज़ा नहीं देती थी. उल्टे सवाल करती थी, आज क्या क्या खेला? कहां कहां गयी? किस किस दोस्त के साथ खेला? वगैरह वगैरह ...... मैं सोच रही थी जीजी डांटेंगी या फिर् मेरी मां से शिकायत करेंगी, या फिर रात का खाना बन्द करने की धमकी देंगी जैसा कि वो अक्सर करती थीं.......... यही सब सोचते सोचते मैं दुरूखे पर आ गयी थी और उस व्यक्ति ने मेरी बांह जो उपर से पकड र्खी थी छोड्कर अब कलाई पकड ली थी और मेरी तरफ अज़ीब भाव से देखते हुए कहा ...... अब घरे आ गयीनी नूं जाईं अब बबुई जी के दरबार में ..... मैं उसकी बात सुन उसे पलट कर देखते हुए आगे बढ ही रही थी कि मेरी घिग्घी बन्ध गयी.........जैसे शेर के सामने मेमेना ...... रास्ते भर मिलीं सारी की सारी घमकियां एक एक करके आंखों के आगे आ गयीं. नानी से मेरी इतनी अधिक मानसिक दूरी थी कि मैं उनसे कुछ कह पाने में सह्ज़ नहीं थी दूसरे मेरे अन्दर एक तरह का बाल स्वाभिमान (ईगो) भी था. मैं बस आंख नीची किये उनके सामने खडी रही ......कोई पांच मिनट भी नहीं बीते होंगे कि सज़ा सुना दी गयी ..........भंडारी को यह हुक्म दे दिया गया कि मुझे घर के भंडार घर में बन्द कर दिया जाये...........और मैं उस घर में बन्द कर दी गयी. घर के अन्य किसी सदस्य ने इसका कोई विरोध भी नहीं किया. यहां तक की मां ने भी नहीं.
मेरा बच्चा मन जिस लोक राग में रमा लगा बाज़ार तक चला गया था वह मुझ बच्चे को ही नहीं नानी के कानों को भी खूब भाता था. मैने अक्सर उन्हें भगत लोगों को रोककर देवी गीत सुनते देखा था. प्रशंसा करते देखा था तो फिर सज़ा किस बात की थी यह समझ्ने के लिये नानी ने मुझे खासा वक्त दिया था.
मैं भंडार घर में बन्द कर दी गयी थी. भंडार घर का माहौल मेरे जैसे बच्चे को डराने के लिये काफी था. बडे बडे बोलो में भरे मकई, चावल, दाल, चना, तेल , सरसों, तीसी और भी तरह के दूसरे सामान..............कमरे में बन्द होने के बाद मेरा खूराफाती दिमाग यह सोचने में लगा था कि यहां बितने वाला वक्त आखिर कैसे काटूंगी........ यह सोचने में भी लगा था कि आखिर कब तक बन्द रहूंगी.........सारे बच्चे ऐसे ड्अरे सहमें थे कि कोई दरवाजे तक आने की हिम्मत नहीं कर रहा था .................और मैं सोच रही थी कि क्या करूं अब ?
मैने उस कमरे की उंची ऊंची खिडकियों की तरफ देखा और उसी पर जाकर बैठ गयी..इस जुगत में कि अगर चट्खनी खुल गयी तो मैं यहां से ही निकल भागूंगी लेकिन वो इतनी ऊंची थीं कि मेरे बस की नहीं थीं ..........फिर भी मैं कोशिश कर रही थी ............ बीच बीच में चूहों की ची ची से मैं सिहर जाया करती थी .............और मां का इंतजार करने लगती थी .......................... अचानक मेरे गुस्से ने अपना काम करना शूरू किया और फिर मैने हनुमान जी की तरह उस घर में रखे कई बोरों को नुकसान पहुंचाया .........सरसों का तेल गिराया..............उसपर तरह तरह के सामान को गिराया जो भी हाथ में मिला उससे बोरियां फाड डालीं फिर सब्से उंचे बोरे पर चढ कर बैठ गयी ........................ कोई दो तीन घंटे बाद दरवाज़ा खुला ............... और मुझे बाहर निकाला गया .....................
इस घटना ने मुझे कई नसीहतें दी थीं......... इस घर के तौर तरीकों और कानून कायदों का अहसास कराया था .............
Saturday, April 6, 2013
एक महल की दास्तान ..............मेरे बचपन के दिन
सोचती हूं, नानी और अपने रिश्ते की कहानी से ही शुरू करूं इस दास्तान को. उनकी और अपनी वैचारिक लडाई से. इस लडाई की बहुत सी वज़हें थीं. सबसे बडी वज़ह देश काल और परिवेश का था. दरअसल अमनौर छपरा जिले से कोई 25 किलोमीटर पर बसा एक ऐसा गांव है जिसकी अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है. अंग्रेजों के समय में उनकी जमीदारी प्रथा के अंतर्गत यह एक छोटी सी स्टेट थी जो किसानो से ;लगान् वसूल कर अंग्रेजों को देती थी. इसलिये इस गांव की संरचना , जातीय गणित , सोच और जीवन जीने का तरीका बेहद सामंतवादी था. जातियों के बीच के अंतरसम्बन्ध बेहद जटिल और बहुत हद तक शोषण पर आधारित स्त्रियों की सोच समाज में उनकी स्थिति सब बेहद जटिल थे. नानी और मेरे बीच जो वैचारिक मतभेद और अन्तर् विरोध था वह इन्हीं के इर्द गिर्द था. नानी अमनौर के उस बबुआन की महिलाओं का प्रतिनिधित्व करती थीं जो एक खास तरह के समाज में जीने की आदी थीं और मेरा पालन पोषण शहर के एक ऐसे माता पिता के साथ हो रहा था जो दोनो नौकरी पेशा थे. फिर आज़म गढ के गांव और उसका समाज बिहार के इस गांव से बेहद अलग सोच वाले थे जो रैयत व्यवाडी व्यव्स्था के अंग थे.
आज जब भी नानी का चेहरा आंखों के सामने आता है एक घटना जैसे चिपकी चली आती है जहन में... एक हल्की सी मुस्कान, तैर जाती है होठों पर, अपनी चंचलता , बचपना और शरारत के बीच नानी का वो क्रोध और वो सजा अब बहुत गुदगुदाती है. सोचती हूं कि अब वह पीढी भी खतम हो गयी जो पहले बच्चों में बेहतर संस्कार डालने के लिये ऐसी ऐसी सजायें देती थीं कि अब भी उसे सोचकर रुह कांप जाये. मैने यहां ऐसी कई सजायें काटी हैं......
वह नवरात्र का महीना था. नवदुर्गे के दिन. बिहार में नवरात्र का महीना कुछ अलग ही रौनक वाला होता था तब. मैं कोई 6-7 साल की ही थी. दशहरे की छुटियों में गयी थी नानी के घर. उस दौर में इस हवेली की लडकियां चाहे वो 5 – 6 साल की भी हों तो उनका बाहर जाना एक तरह से प्रतिबन्धित था. हर लडकी और उसको खिलाने वाली को यह सख्ती से सिखाया जाता था कि बेहत्र हो कि वो घर के भीतर ही खेलें. किंतु मैं इस जमात से अलग घर के अन्दर के वातावरण से अलग बाहर खेलना पसन्द करती थी. मुझे बाहर ताड खज़ूर के पेड देखना, सामने की फुल्वाडी में तितली पकडना , आस पास के घरों में चुपके से जाकर बैठ जाना बेहद रास आता था. जबकि इसकी सख्त मनाही होती थी बहां. कई बार जब घर पर लोगों को पता चल जाता था जब वो इस कमेंट के साथ नज़रन्दाज़ कर देते थे कि ‘ उ का जाने इहां के रेवाज़’ औउर उनका कौन हमेशा रहे के बा इहां; पर फिर भी सखत निहरानी रहती थी.
एक दिन मैं बाहर के बरामदे में खडी सामने की फुल्वाडी से तितकी पकडने की सोच ही रही थी कि मुझे दूर से एक बहुत ही मधुर आवाज़ कान में सुनाई दी ....वहां का एक लोकल वाद्य जिसे खडताल कहते हैं उसकी आवाज़ इतना मुग्ध कर रही थी मैं चुपचाप वहां खडी यह ध्यान लगाने में मस्त थी कि यह आवाज़ कहां से आ रही है. कौन गा रहा है ..आवाज़ धीरे धीरे करीब आने लगी थी और स्वर साफ हो रहा था ......... वह एक देवी गीत था जो एक बेहद सुमधुर के साथ मुझे अपने सम्मोहन में ले रहा था ....... निबिया की डाल मईया
लावेली हिलोरवा कि झूमि झूमि
माई मोरा गावेली गीत कि
झूमी झूमी
झुमते झूमत मईया के लागल पियसिया
कि एक छाक मोहि के पनिया
पिया द कि एक छाक
अचानक मैने देखा कि एक बूढा व्यक्ति हाथ में खडताल लिये कुछ और लोगों के साथ दरवाजे पर आ खडा हुआ है. वह अपने हाथ की खडताल को इतने सधे तरीके से बज़ा रहा था कि कान वहीं जमें थे अब तक. मैं पूरे सम्मोहन में थी. ऐसे सम्मोहन में जो अपनी आगोश में ले चुका था. यह भगत लोगों की टोली थी. जो नवरात्रों में देवीगीत गाते थे , जो अपनी भिक्षा मांगते थे और अपना गुजारा करते थे. बहरहाल .......भगत को जैसे ही अन्दर से आकर किसी ने भिक्षा दी वह अगले घर की तरफ बढने लगा. उसके गाने में और स्वर में जो सम्मोहन था मैं उससे अभी उबर नहीं पायी थी . इसी सम्मोहन में मैं उसके पीछे पीछे जहां जहां वह जाता चलती गयी. मुझे इस बात का पता नहीं चला कि मैं गांव के किस किस घर के सामने भीख मांगने वाले इस भगत के साथ घूमती रही. मुझे इस बात का भी आभास नहीं हुआ कि मैं उस भगत के स्वर में स्वर मिलाके गाती रही. और इस बात का भी आभास नहीं हुआ कि किसने मुझे उसके साथ देखा , किसने नहीं देखा. मैं बस उस भगत के पीछे देवीगीत गाते – गुनगुनाते और उस बूढे भगत का स्वर सुनते गांव के बाज़ार तक पहुंच गयी थी. इधर घर में सब तरफ मेरी खोज मच गयी थी. सबने सारा घर छान मारा मैं जब कहीं नहीं मिली. घर पर अफरा तफरी मची हुई थी ....आस पास के हर घर में पूछा जा रहा था कि किसी ने मुझे देखा ? तभी नानी को किसी ने सूचना दी कि मैं बाज़ार में हूं...
बाज़ार इस हवेली के लोगों के लिये सर्वथा वर्जित जगह थी. लडकियां तो दूर की बात घर के लड्के भी वहां नहीं जाते थे और ऐसे में मैं दरबार की नातिन बाज़ार पहुंच गयी थी. यह घूर गुस्ताखी थी मेरी . एक ऐसा अपराध जिसपर बहुत सख्त सज़ा का प्रावधान था. जहां माफी बिल्कुल नहीं थी. जहां नानी की निगाहों , उनके जज्मेंट से बच पाना बेहद मुश्किल था.
थोडी देर बाद मैं पकड कर घर लायी गयी. जो व्यक्ति मुझे बाज़ार से पकड कर ला रहा था उसने मुझे कुछ इस तरह से धमकियां दी थीं कि मैं रास्ते में ही अंज़ाम से परिचित हो गयी थी. वह कह रहा था : भला बतायीं त दरबार के लईकी और ए तरह बज़ार में घूमतानी? र उ आ तनिको डर ना लागल कि बबुई जी राउर का हाल करम ?
चलीं ..अब पता लागी.....मज़ा आयी भागे के मतलब समझ में आयी .......... मेरे अन्दर अज़ीब अज़ीब भाव आ रहे थे. डर भी लग रहा था. पर इस बात का अन्दाज़ा नहीं था कि घर के लोग इस कदर गुस्सा करेंगे ....
आज जब भी नानी का चेहरा आंखों के सामने आता है एक घटना जैसे चिपकी चली आती है जहन में... एक हल्की सी मुस्कान, तैर जाती है होठों पर, अपनी चंचलता , बचपना और शरारत के बीच नानी का वो क्रोध और वो सजा अब बहुत गुदगुदाती है. सोचती हूं कि अब वह पीढी भी खतम हो गयी जो पहले बच्चों में बेहतर संस्कार डालने के लिये ऐसी ऐसी सजायें देती थीं कि अब भी उसे सोचकर रुह कांप जाये. मैने यहां ऐसी कई सजायें काटी हैं......
वह नवरात्र का महीना था. नवदुर्गे के दिन. बिहार में नवरात्र का महीना कुछ अलग ही रौनक वाला होता था तब. मैं कोई 6-7 साल की ही थी. दशहरे की छुटियों में गयी थी नानी के घर. उस दौर में इस हवेली की लडकियां चाहे वो 5 – 6 साल की भी हों तो उनका बाहर जाना एक तरह से प्रतिबन्धित था. हर लडकी और उसको खिलाने वाली को यह सख्ती से सिखाया जाता था कि बेहत्र हो कि वो घर के भीतर ही खेलें. किंतु मैं इस जमात से अलग घर के अन्दर के वातावरण से अलग बाहर खेलना पसन्द करती थी. मुझे बाहर ताड खज़ूर के पेड देखना, सामने की फुल्वाडी में तितली पकडना , आस पास के घरों में चुपके से जाकर बैठ जाना बेहद रास आता था. जबकि इसकी सख्त मनाही होती थी बहां. कई बार जब घर पर लोगों को पता चल जाता था जब वो इस कमेंट के साथ नज़रन्दाज़ कर देते थे कि ‘ उ का जाने इहां के रेवाज़’ औउर उनका कौन हमेशा रहे के बा इहां; पर फिर भी सखत निहरानी रहती थी.
एक दिन मैं बाहर के बरामदे में खडी सामने की फुल्वाडी से तितकी पकडने की सोच ही रही थी कि मुझे दूर से एक बहुत ही मधुर आवाज़ कान में सुनाई दी ....वहां का एक लोकल वाद्य जिसे खडताल कहते हैं उसकी आवाज़ इतना मुग्ध कर रही थी मैं चुपचाप वहां खडी यह ध्यान लगाने में मस्त थी कि यह आवाज़ कहां से आ रही है. कौन गा रहा है ..आवाज़ धीरे धीरे करीब आने लगी थी और स्वर साफ हो रहा था ......... वह एक देवी गीत था जो एक बेहद सुमधुर के साथ मुझे अपने सम्मोहन में ले रहा था ....... निबिया की डाल मईया
लावेली हिलोरवा कि झूमि झूमि
माई मोरा गावेली गीत कि
झूमी झूमी
झुमते झूमत मईया के लागल पियसिया
कि एक छाक मोहि के पनिया
पिया द कि एक छाक
अचानक मैने देखा कि एक बूढा व्यक्ति हाथ में खडताल लिये कुछ और लोगों के साथ दरवाजे पर आ खडा हुआ है. वह अपने हाथ की खडताल को इतने सधे तरीके से बज़ा रहा था कि कान वहीं जमें थे अब तक. मैं पूरे सम्मोहन में थी. ऐसे सम्मोहन में जो अपनी आगोश में ले चुका था. यह भगत लोगों की टोली थी. जो नवरात्रों में देवीगीत गाते थे , जो अपनी भिक्षा मांगते थे और अपना गुजारा करते थे. बहरहाल .......भगत को जैसे ही अन्दर से आकर किसी ने भिक्षा दी वह अगले घर की तरफ बढने लगा. उसके गाने में और स्वर में जो सम्मोहन था मैं उससे अभी उबर नहीं पायी थी . इसी सम्मोहन में मैं उसके पीछे पीछे जहां जहां वह जाता चलती गयी. मुझे इस बात का पता नहीं चला कि मैं गांव के किस किस घर के सामने भीख मांगने वाले इस भगत के साथ घूमती रही. मुझे इस बात का भी आभास नहीं हुआ कि मैं उस भगत के स्वर में स्वर मिलाके गाती रही. और इस बात का भी आभास नहीं हुआ कि किसने मुझे उसके साथ देखा , किसने नहीं देखा. मैं बस उस भगत के पीछे देवीगीत गाते – गुनगुनाते और उस बूढे भगत का स्वर सुनते गांव के बाज़ार तक पहुंच गयी थी. इधर घर में सब तरफ मेरी खोज मच गयी थी. सबने सारा घर छान मारा मैं जब कहीं नहीं मिली. घर पर अफरा तफरी मची हुई थी ....आस पास के हर घर में पूछा जा रहा था कि किसी ने मुझे देखा ? तभी नानी को किसी ने सूचना दी कि मैं बाज़ार में हूं...
बाज़ार इस हवेली के लोगों के लिये सर्वथा वर्जित जगह थी. लडकियां तो दूर की बात घर के लड्के भी वहां नहीं जाते थे और ऐसे में मैं दरबार की नातिन बाज़ार पहुंच गयी थी. यह घूर गुस्ताखी थी मेरी . एक ऐसा अपराध जिसपर बहुत सख्त सज़ा का प्रावधान था. जहां माफी बिल्कुल नहीं थी. जहां नानी की निगाहों , उनके जज्मेंट से बच पाना बेहद मुश्किल था.
थोडी देर बाद मैं पकड कर घर लायी गयी. जो व्यक्ति मुझे बाज़ार से पकड कर ला रहा था उसने मुझे कुछ इस तरह से धमकियां दी थीं कि मैं रास्ते में ही अंज़ाम से परिचित हो गयी थी. वह कह रहा था : भला बतायीं त दरबार के लईकी और ए तरह बज़ार में घूमतानी? र उ आ तनिको डर ना लागल कि बबुई जी राउर का हाल करम ?
चलीं ..अब पता लागी.....मज़ा आयी भागे के मतलब समझ में आयी .......... मेरे अन्दर अज़ीब अज़ीब भाव आ रहे थे. डर भी लग रहा था. पर इस बात का अन्दाज़ा नहीं था कि घर के लोग इस कदर गुस्सा करेंगे ....
एक महल की दास्तान ---------मेरे बचपन के दिन
मैं चुप , नि:शब्द सब् देख रही थी ........ ये हवेली , उसका निर्जन हो जाना, जर्जर हो जाना और इतना बदसूरत हो जाना एक गहरे अवसाद में दाल रहा था और दूसरी तरफ एक खूबसूरत जवान महिला से एक जर्जर काया में तब्दील उस महिला और उसकी आवाज़ मुझे यह सोचने को मज्बूर कर रही थी कि सच मुच यह संसार म्रर्त्यलोक है ............
वहां पहुंचने पर खबर लगते ही धीरे धीरे कई चेहरे घेर लेते हैं मुझे मैं उन चेहरों में से कुछ को ही बडी मुश्किल से पहचान पाती हूं पर वो सभी बुलबुल्ल बबुनी को खूब पहचान लेते हैं. इन चेहरों में से कई आईस पाईस खेल के खिलादी थे. उनकी स्मृतियों में भी मैं कहीं बसी हुई थी इसलिये यादों की पर्तों के साथ हमारे चेहरे पर हल्की मुस्कान दौडी और हवेली के घास के मैदान में ही बैठ गये कुछ देर के लिये ......
मेरे अन्दर इस हवेली में जाकर उसे देखने का साहस अभी नहीं जुट पा रहा, बस एक टक मैं उसे देख रही हूं. हर तरफ से जर्जर, टूट चुकी , बेजान उस हवेली का एक ऐसा चेहरा मेरी स्मृतियों में कैद है जो मुझे जीवन देता है, कल्पना देता है, पीछे लौट्कर सोचने उसे लिखने का साहस देता है और उसी हवेली की यह हालत देखकर रो पडना स्वाभाविक था.. मैं जैसे जैसे कदम बडा रही हूं यह दुख बढता जा रहा है. आंसू इस दुख को व्यत ही नहीं कर सकते जिस भाव ने मुझे घेर रखा है. रात इसी खंडहर में गुज़ारनी है यह सूचना सारी व्यवस्थाओं के बाद मुझे यहां की केयर टेकर ने दे दी है लेकिन मैं तो उजाले में इस बुजुर्ग जैसी हवेली का हाल चाल लेने के लिये आगे बढ रही थी. इस हवेली का बडा हिस्सा या यों कहें कि एक अलग मकान सा हिस्सा बहुत लम्बे अरसे तक अस्पताल रहा था मैं अभी उसी घर के सामने खडी हूं और पलट कर 4-5 साल की बुलबुल बन जाती हूं ............
अम्मा तब नौकरी करती थी. आज़मगढ जी जी आई सी में साईंस की अध्यापिका थी..मेरी हर गर्मी की छुट्टी छपरा जिले के इस छोटे से गांव अमनौर में बीतती थी. हम इसे अपना ननिहाल कहते थे जबकि ये मेरी मां का ननिहाल था.. अम्मा के ननिहाल से कब यह हमारा ननिहाल बन गया यह एक लम्बी कहानी है लेकिन हम चारो भाई बहन के ज़हन में यह हवेली, यह देश , यहां के लोग कुछ ऐसे बसे हैं कि उन्हें हटा पाना हमारे लिये कभी सम्भव नहीं रहा.. सच कहूं तो यहां से जुडी हर एक चीज़ हमारी यादों के बडे महत्व्पूर्ण किरदार बनकर् बैठे हैं. सोच रही हूं कहां से शुरू करूं इस हवेली की दास्तान.... किस मोड से , किस किरदार से या फिर वहां से जहां से स्मृतियों के पहली पर्त की शुरूआत होती है. जहां से आंखों ने इसे देखना और समझना शुरू किया..............
मैं हवेली के बाहरी खम्भे को पकड के पुराने दिनों में लौट जाती हूं ...वही 6-7 साल की बुलबुल के रूप में और इसके एक एक कोने की रौनक को रंग देने लगती हूं........... कई किस्से जो इस हवेली के बारे में नानी से सुने थे वो याद आते हैं.....कई कहानियां जो यहां के पवंरिया सुनाते थे वो याद आते हैं ........ और फिर याद आती है हवेली के जीवंत दिन...... जब चारो तरफ लोग ही लोग थे .....जब चारो तरफ .......आवाज़ें ही आवाज़ें ........हमारी आईस – पाईस , एक्कट –दुक्कट , भागना – दौडना, बिना बात खिलखिलाना, धमा चौकडी करना, आम के पाल से आम चुराना, सज़ा के तौर पर भन्डार घर में बन्द कर दिया जाना और फिर नानी की लाल लाल आंखों का घूरना .......सच कहूं तो वो आंखें आज भी डराती हैं मुझे ............
वहां पहुंचने पर खबर लगते ही धीरे धीरे कई चेहरे घेर लेते हैं मुझे मैं उन चेहरों में से कुछ को ही बडी मुश्किल से पहचान पाती हूं पर वो सभी बुलबुल्ल बबुनी को खूब पहचान लेते हैं. इन चेहरों में से कई आईस पाईस खेल के खिलादी थे. उनकी स्मृतियों में भी मैं कहीं बसी हुई थी इसलिये यादों की पर्तों के साथ हमारे चेहरे पर हल्की मुस्कान दौडी और हवेली के घास के मैदान में ही बैठ गये कुछ देर के लिये ......
मेरे अन्दर इस हवेली में जाकर उसे देखने का साहस अभी नहीं जुट पा रहा, बस एक टक मैं उसे देख रही हूं. हर तरफ से जर्जर, टूट चुकी , बेजान उस हवेली का एक ऐसा चेहरा मेरी स्मृतियों में कैद है जो मुझे जीवन देता है, कल्पना देता है, पीछे लौट्कर सोचने उसे लिखने का साहस देता है और उसी हवेली की यह हालत देखकर रो पडना स्वाभाविक था.. मैं जैसे जैसे कदम बडा रही हूं यह दुख बढता जा रहा है. आंसू इस दुख को व्यत ही नहीं कर सकते जिस भाव ने मुझे घेर रखा है. रात इसी खंडहर में गुज़ारनी है यह सूचना सारी व्यवस्थाओं के बाद मुझे यहां की केयर टेकर ने दे दी है लेकिन मैं तो उजाले में इस बुजुर्ग जैसी हवेली का हाल चाल लेने के लिये आगे बढ रही थी. इस हवेली का बडा हिस्सा या यों कहें कि एक अलग मकान सा हिस्सा बहुत लम्बे अरसे तक अस्पताल रहा था मैं अभी उसी घर के सामने खडी हूं और पलट कर 4-5 साल की बुलबुल बन जाती हूं ............
अम्मा तब नौकरी करती थी. आज़मगढ जी जी आई सी में साईंस की अध्यापिका थी..मेरी हर गर्मी की छुट्टी छपरा जिले के इस छोटे से गांव अमनौर में बीतती थी. हम इसे अपना ननिहाल कहते थे जबकि ये मेरी मां का ननिहाल था.. अम्मा के ननिहाल से कब यह हमारा ननिहाल बन गया यह एक लम्बी कहानी है लेकिन हम चारो भाई बहन के ज़हन में यह हवेली, यह देश , यहां के लोग कुछ ऐसे बसे हैं कि उन्हें हटा पाना हमारे लिये कभी सम्भव नहीं रहा.. सच कहूं तो यहां से जुडी हर एक चीज़ हमारी यादों के बडे महत्व्पूर्ण किरदार बनकर् बैठे हैं. सोच रही हूं कहां से शुरू करूं इस हवेली की दास्तान.... किस मोड से , किस किरदार से या फिर वहां से जहां से स्मृतियों के पहली पर्त की शुरूआत होती है. जहां से आंखों ने इसे देखना और समझना शुरू किया..............
मैं हवेली के बाहरी खम्भे को पकड के पुराने दिनों में लौट जाती हूं ...वही 6-7 साल की बुलबुल के रूप में और इसके एक एक कोने की रौनक को रंग देने लगती हूं........... कई किस्से जो इस हवेली के बारे में नानी से सुने थे वो याद आते हैं.....कई कहानियां जो यहां के पवंरिया सुनाते थे वो याद आते हैं ........ और फिर याद आती है हवेली के जीवंत दिन...... जब चारो तरफ लोग ही लोग थे .....जब चारो तरफ .......आवाज़ें ही आवाज़ें ........हमारी आईस – पाईस , एक्कट –दुक्कट , भागना – दौडना, बिना बात खिलखिलाना, धमा चौकडी करना, आम के पाल से आम चुराना, सज़ा के तौर पर भन्डार घर में बन्द कर दिया जाना और फिर नानी की लाल लाल आंखों का घूरना .......सच कहूं तो वो आंखें आज भी डराती हैं मुझे ............
Friday, April 5, 2013
एक महल की दास्तान ---- मेरे बचपन के दिन
‘बुलबुल’ इसी नाम से मेरे मा – बाप और बडे- बुजुर्ग मुझे घर में पुकारते थे. पापा को छोडकर अब इस नाम से बुलाने वाले इक्का- दुक्का बचे हैं. कई बार कान तरस जाते हैं यह नाम किसी के मुंह से सुनने को. पर आज इस हवेली के हर कोने आवाज आ रही है जैसे कितने ही लोग बुला रहे है. उपर बालकनी से नानी की आवाज़ सुनाई दे रही है और नीचे दरोखे से भंडारी की आवज़ आ रही है ‘ ए बूलबूल बबुनी आ गयीनी’ . चौका अनगना से ललमतिया की माई कह रही हैं कि ए बुलबुल बबुनी हाल्दी हाल्दी हाथ गोड धो लीं........ बीजे बाद में होई रउआ भूख लागल होई खा लीं तनी त खेलम....... सुनी ना का खायेम .... चना के सतुई और धी चीनी........ मैं जवाब देती हूं जैसे ....इस खंडहर हो गयी हवेली की एक एक ईंट में जैसे मेरी यादों का खज़ाना है सब किसी फिल की रील की तरह चल रही है मेरी आंख के सामने. मैं यहां इस बार 1992 के बाद आयी हूं.... इससे पहले नानी की मृत्यु पर आयी थी तब यह नहीं सोचा था कि अगली बार जब आउंगी तब यह इस कदर खंडहर हो चुकी होगी. नहीं सोचा था कि बचपन के सब चेहरे फिर देखने को नहीं मिलेंगे. ललमतिया, सुमतिया, सुदमवा, देवंतिया, संवरिया किसी से मुलाकात नहीं होगी......सोचा नहीं था कि ललमतिया की माई कभी नहीं दिखेंगी .आज सब याद आ रहे हैं. वो सारे चेहरे जिसने मुझे प्यार दिया , खाना खिलाया, मेरे ननिहाल पहुंचने पर ऐसे न्योछवर हुए जैसे मैं उनकी अपनी औलाद हौउ. मुझे अपने ननिहाल का ये देश, यहां के लोग, उनकी जबान, उनका चरित्र, उनके भाव, ये ताड के पेड, यहां मिट्टी की सुगन्ध, यहां का लोक संगीत , यहां की भाषा कुछ इस कदर प्यारे हैं कि मैं इसे दिल एं लिये फिरती हूं. इसी लिये आज जब यहां आयी हूं अभी तक अपनी हवेली के भीतर नहीं गयी हूं. बस बाहर बाहर घूम रही हूं ......... उन चेहरों को खोज रही हूं जो मेरी स्मृतियों को रंग देते हैं. जो मेरे अनतर में जमें बैठे हैं. जो मुझे शब्द देते हैं , सुर देते हैं राग रागिनियों से परिचय कराते हैं और लिखने का अकूत साहस देते हैं........ मैं उनको ही खोज रही हूं बेचैन होकर .......रधिकवा, उसकी माई, भोलवा, शोभवा याद कर कर के सबसे पूछ रही हूं कि कहीं से कोई धागा मिले तो मैं वो मोती पिरोना शुरू करूं ...........पर उनमें से बस एक दो मिली हैं और मेरे अन्दर जैसे एक हूक उठ रही है ......एक कराह ..... एक ऐसी कराह जिसे मैं किसी को सुना भी नहीं सकती ना ही किसी से साझा कर सकती हूं ...............चुपचाप एक पेड के नीचे खडी हो सोच रही हूं कि क्या समय इतना पीछे चूट गया .इतना पीछे .........सब कुछ इतना बदल गया ? इतना बदल गया ? आखिर इतने दिनों के बीच मैं क्यों नहीं आयी यहां ? खां फंसी रही कि नहीं आ पायी ? खुद से सवाल करती रही घंटों .....कोसती रही अपने आप को तभी लगा जैसे पीछे से किसी ने बुलाया ..............बुलबुल चिरई आ गयीली का ? आरे हमर बाछी .......आ गयीनी रउआ ......... आवाज़ इतनी धीमी थी कि शक्क हुआ अपने आप पर कि ये मैं कैसे सुन सकती हूं ? कई बार सोचा कान बज रहे हैं मेरे इसी उमर में ..........पर तभी एक वृद्ध हाथ मे मुझे छुआ .....जैसे आत्मा तृप्त हो गयी ...........मेरी आंखे और उनकी आंखे मिलीं और ........ काहे एज़वा बईठल् बानी बबुनी ? काहे ?
देवंतिया के माई रउआ हमरा पहचान गयीनी ? कइसे ? एतना दिन बाद ?
ए बाबू भला रउआ के ना पहचानेम ? ए हमर बाछी देखी ना केतना बढियां लागता ..... राउर पाहुन केने बानी ? उंहों के आयेल बानी नूं ?
देवंतिया के माई रउआ हमरा पहचान गयीनी ? कइसे ? एतना दिन बाद ?
ए बाबू भला रउआ के ना पहचानेम ? ए हमर बाछी देखी ना केतना बढियां लागता ..... राउर पाहुन केने बानी ? उंहों के आयेल बानी नूं ?
Tuesday, April 2, 2013
अकेले होने के दर्द
लाडली होने का सुख
अकेले होने के दर्द से
बहुत कमतर होता है
लेकिन दुनिया
मेरे अकेले होने को
मेरे सुखी और सौभाग्यशाली
होने से जोडकर देखती रही है
जबकि मैं
इस अकेलेपन की व्यथा
लिये भटकती रही हूं
इधर – उधर
तीन भाइयों के बीच
मेरे मन का हर कोना
टकटकी लगाये देखता रहा है
उनके खेल, उनका बल, उनका मन
उनके आपस का एका
उनकी खुशी , खुशी की कुलांचे
उनके होने से मनो सौभाग्य का बोझ लिये मैं
चुप चाप गिनती रही हूं
अपना सुख
छिपाती रही हूं
अकेलापन
अपनी व्यथा – कथा
आंखों की नमकीन होती कोर
और एक कमजोर मन
...............................................अल्का
अकेले होने के दर्द से
बहुत कमतर होता है
लेकिन दुनिया
मेरे अकेले होने को
मेरे सुखी और सौभाग्यशाली
होने से जोडकर देखती रही है
जबकि मैं
इस अकेलेपन की व्यथा
लिये भटकती रही हूं
इधर – उधर
तीन भाइयों के बीच
मेरे मन का हर कोना
टकटकी लगाये देखता रहा है
उनके खेल, उनका बल, उनका मन
उनके आपस का एका
उनकी खुशी , खुशी की कुलांचे
उनके होने से मनो सौभाग्य का बोझ लिये मैं
चुप चाप गिनती रही हूं
अपना सुख
छिपाती रही हूं
अकेलापन
अपनी व्यथा – कथा
आंखों की नमकीन होती कोर
और एक कमजोर मन
...............................................अल्का
Saturday, March 16, 2013
तुम मिले
तुम अनाम थे, अनजान
मिलने से पहले
तुम स्वप्न थे हथेलियों पर
मिलने से पहले
तुम मिले तो
जहन में अचानक
एक नाम तैरने लगा
पहचाना पहचाना
अनजान यह शब्द
गुम हो गया था
तेज़ हवाओं के साथ
तुम मिले तो
जैसे
स्वप्न हथेलियों पर उतर आये
हकीकत बनके
अनजान वह नाम
रफ्ता रफ्ता
हकीकत की तहरीर
लिखने लगा
तुम मिले तो
जिन्दगी जैसे गुनगुनी धूप सी
पसर गयी थी
पोर पोर में
गहरे उतर कर
मन की चाक पर जिन्दगी के
शब्द गढने लगे
तुम्हारे इर्द गिर्द
तुम मिले तो
मरमरी, मखमली अहसास
हवा में तैर गये थे
हौले हौले
क्या तुमने भी
ऐसा ही महसूस किया था
मुझसे मिलने के बाद ?
क्या तुम्हारे लिये भी
मेरे मायने वही हैं ?
तुम्हारी प्रश्न वाचक निगाहों से
पता चल रहा है कि
मेरे सवाल तुमको बेचैन कर रहे हैं
तुम असमंजस में हो
पर क्या करूं
मन में सवाल है
सो पूछ लिया
जवाब चहती हूं
तुमसे
क्योंकि तुम मिले तब से
गुम हो गयी थी मैं
आज खोज़ा है
कई सवालों के
बीच
अकेली खडी खुद को
.................................................अलका
मिलने से पहले
तुम स्वप्न थे हथेलियों पर
मिलने से पहले
तुम मिले तो
जहन में अचानक
एक नाम तैरने लगा
पहचाना पहचाना
अनजान यह शब्द
गुम हो गया था
तेज़ हवाओं के साथ
तुम मिले तो
जैसे
स्वप्न हथेलियों पर उतर आये
हकीकत बनके
अनजान वह नाम
रफ्ता रफ्ता
हकीकत की तहरीर
लिखने लगा
तुम मिले तो
जिन्दगी जैसे गुनगुनी धूप सी
पसर गयी थी
पोर पोर में
गहरे उतर कर
मन की चाक पर जिन्दगी के
शब्द गढने लगे
तुम्हारे इर्द गिर्द
तुम मिले तो
मरमरी, मखमली अहसास
हवा में तैर गये थे
हौले हौले
क्या तुमने भी
ऐसा ही महसूस किया था
मुझसे मिलने के बाद ?
क्या तुम्हारे लिये भी
मेरे मायने वही हैं ?
तुम्हारी प्रश्न वाचक निगाहों से
पता चल रहा है कि
मेरे सवाल तुमको बेचैन कर रहे हैं
तुम असमंजस में हो
पर क्या करूं
मन में सवाल है
सो पूछ लिया
जवाब चहती हूं
तुमसे
क्योंकि तुम मिले तब से
गुम हो गयी थी मैं
आज खोज़ा है
कई सवालों के
बीच
अकेली खडी खुद को
.................................................अलका
Friday, March 8, 2013
स्त्रियों की कलम से
फेसबुक पर एक मित्र ने मेरी एक पोस्ट पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कमेंट करते हुए कहा था कि साहित्य में भी लिंग भेद ? कई दिग्गजों ने उनका समर्थन किया था ...............पिछले कुछ दिनो से स्त्री विमर्श पर कुछ नयी स्त्री कवियत्रियों को पढ रही हूं .....और कुछ पुरुष रचनाकारों को भी सभी की रचनाओं में उनके होने का ही नहीं बल्कि उनके अहसास , उनके सोचने और उनके परिवेश का रंग साफ साफ नज़र आता है. स्त्रियों ने अपने अह्सास को लिखा है , अपने प्रश्न उठाये हैं और अपनी बात क इस विषय पर उसके पकड की कमी साफ साफ ही है वहीं दूसरी तरफ पुरुष अभी स्त्री को कई मायनों में समझने की प्रक्रिया एं ही है,उसके मन , उसकी अनुभूति और उसके मंथन से दूर बस समझ रहा है उसे.............. स्त्री होने के अब तक के अर्थ और स्त्री के सवाल स्त्रियों ने किस तरह उठाये हैं महिला दिवस पर कम से कम 3 कवियत्रियों की कलम को पढिये ---------
पहली कवियत्री हैं अनामिका ................ दूसरी कवियत्री हैं अपर्णा मनोज और तीसरी कवियत्री हैं लीना मल्होत्रा राव ...........
1.
पढ़ा गया हमको
जैसे पढ़ा जाता है काग़ज
बच्चों की फटी कॉपियों का
‘चनाजोरगरम’ के लिफ़ाफ़े के बनने से पहले!
देखा गया हमको
जैसे कि कुफ्त हो उनींदे
देखी जाती है कलाई घड़ी
अलस्सुबह अलार्म बजने के बाद !
सुना गया हमको
यों ही उड़ते मन से
जैसे सुने जाते हैं फ़िल्मी गाने
सस्ते कैसेटों पर
ठसाठस्स ठुंसी हुई बस में !
भोगा गया हमको
बहुत दूर के रिश्तेदारों के दुख की तरह
एक दिन हमने कहा–
हम भी इंसान हैं
हमें क़ायदे से पढ़ो एक-एक अक्षर
जैसे पढ़ा होगा बी.ए. के बाद
नौकरी का पहला विज्ञापन।
देखो तो ऐसे
जैसे कि ठिठुरते हुए देखी जाती है
बहुत दूर जलती हुई आग।
सुनो, हमें अनहद की तरह
और समझो जैसे समझी जाती है
नई-नई सीखी हुई भाषा।
इतना सुनना था कि अधर में लटकती हुई
एक अदृश्य टहनी से
टिड्डियाँ उड़ीं और रंगीन अफ़वाहें
चींखती हुई चीं-चीं
‘दुश्चरित्र महिलाएं, दुश्चरित्र महिलाएं–
किन्हीं सरपरस्तों के दम पर फूली फैलीं
अगरधत्त जंगल लताएं!
खाती-पीती, सुख से ऊबी
और बेकार बेचैन, अवारा महिलाओं का ही
शग़ल हैं ये कहानियाँ और कविताएँ।
फिर, ये उन्होंने थोड़े ही लिखीं हैं।’
(कनखियाँ इशारे, फिर कनखी)
बाक़ी कहानी बस कनखी है।
हे परमपिताओं,
परमपुरुषों–
बख्शो, बख्शो, अब हमें बख्शो!
Anamika
2.
तुम स्वीकार करते हो
लिप्साओं के संसार में तुम एक ययाति
याचक
प्रेमी
पति
पिता भी तो हो तुम
तुम्हारा स्वार्थ एक कायांतर पुरु की देह से गुज़रते हुए
शर्मिष्ठा तक !
मैं स्वीकार करती हूँ तुम्हारा अपरिमित स्नेह जैसे "बुद्ध"
मेरी अधीरता के महल से बाहर गमन करता
दुखों को मांजता
अतियों के दुर्निवार जंगल में
सरल रास्ता
जिस पर चल सके आम्रपाली .
हम दो ..
कई अंतर विरोधों में जीते -मरते
अंतत: उस बिंदु पर रुक जाते हैं सहसा
जहाँ से मैं टकटकी लगाये देखती हूँ
अपने भीतर का सुन्दरतम पुरुष कमियों के साथ
और तुम ठगे से चाहते हो भरपूर एक स्त्री मौन में प्रतिवाद करती
अपने भीतर गहन .
अहम् की स्लेटों की अदला -बदली करते
दोनों की निश्छल हंसी और निश्चिन्तता सहज हो लिखती है
सान्द्र प्रेम ..
सूख -सूख पट्टी
चन्दन घट्टी...
बीत चुकी है मावट की बरसात
सूख रही हैं हमारी छोटी -छोटी स्वीकृतियां गुनगुनी धूप में बाहर
कितनी पूरक ..
अपर्णा manoj
3.
ओह बहुरूपिये पुरुष !
पति
एक दिन
तुम्हारा ही अनुगमन करते हुए
मैं उन घटाटोप अँधेरे रास्तो पर भटक गई
निष्ठा के गहरे गह्वर में छिपे आकर्षण के सांप ने मुझे भी डस लिया था
उसके विष का गुणधर्म वैसा ही था
जो पति पत्नी के बीच विरक्ति पैदा कर दे
इतनी
कि दोनों एक दूसरे के मरने की कामना करने लगें.
तभी जान पाई मै कि क्या अर्थ होता है ज़ायका बदल लेने का
और विवाह के बाद के प्रेम में कितना सुख छिपा होता है
और तुम क्यों और कहाँ चले जाते हो बार बार मुझे छोड़कर ..
मैं तुम्हारे बच्चो की माँ थी
कुल बढ़ाने वाली बेल
और अर्धांगिनी
तुम लौट आये भीगे नैनों से हाथ जोड़ खड़े रहे द्वार
तुम जानते थे तुम्हारा लौटना मेरे लिए वरदान होगा
और मैं इसी की प्रतीक्षा में खड़ी मिलूंगी
मेरे और तुम्हारे बीच
फन फैलाये खड़ा था कालिया नाग
और इस बार
मैं चख चुकी थी स्वाद उसके विष का
यह जानने के बाद
तुम
थे पशु ...
मै वैश्या दुराचारिणी ..
ओ प्रेमी!
भटकते हुए जब मैं पहुंची तुम्हारे द्वार
तुमने फेका फंदा
वृन्दावन की संकरी गलियों के मोहपाश का
जिनकी आत्मीयता में खोकर
मैंने सपनो के निधिवन को बस जाने दिया था घर की देहरी के बाहर
गर्वीली नई धरती पर प्यार की फसलों का वैभव फूट रहा था
तुमने कहा
राधा !
राधा ही हो तुम..
और
प्रेम पाप नही..
जब जब
पति से प्रेमी बनता है पुरुष
पाप पुन्य की परिभाषा बदल जाती है
देह आत्मा
और
स्त्री
वैश्या से राधा बन जाती है..
-लीना मल्होत्रा
पहली कवियत्री हैं अनामिका ................ दूसरी कवियत्री हैं अपर्णा मनोज और तीसरी कवियत्री हैं लीना मल्होत्रा राव ...........
1.
पढ़ा गया हमको
जैसे पढ़ा जाता है काग़ज
बच्चों की फटी कॉपियों का
‘चनाजोरगरम’ के लिफ़ाफ़े के बनने से पहले!
देखा गया हमको
जैसे कि कुफ्त हो उनींदे
देखी जाती है कलाई घड़ी
अलस्सुबह अलार्म बजने के बाद !
सुना गया हमको
यों ही उड़ते मन से
जैसे सुने जाते हैं फ़िल्मी गाने
सस्ते कैसेटों पर
ठसाठस्स ठुंसी हुई बस में !
भोगा गया हमको
बहुत दूर के रिश्तेदारों के दुख की तरह
एक दिन हमने कहा–
हम भी इंसान हैं
हमें क़ायदे से पढ़ो एक-एक अक्षर
जैसे पढ़ा होगा बी.ए. के बाद
नौकरी का पहला विज्ञापन।
देखो तो ऐसे
जैसे कि ठिठुरते हुए देखी जाती है
बहुत दूर जलती हुई आग।
सुनो, हमें अनहद की तरह
और समझो जैसे समझी जाती है
नई-नई सीखी हुई भाषा।
इतना सुनना था कि अधर में लटकती हुई
एक अदृश्य टहनी से
टिड्डियाँ उड़ीं और रंगीन अफ़वाहें
चींखती हुई चीं-चीं
‘दुश्चरित्र महिलाएं, दुश्चरित्र महिलाएं–
किन्हीं सरपरस्तों के दम पर फूली फैलीं
अगरधत्त जंगल लताएं!
खाती-पीती, सुख से ऊबी
और बेकार बेचैन, अवारा महिलाओं का ही
शग़ल हैं ये कहानियाँ और कविताएँ।
फिर, ये उन्होंने थोड़े ही लिखीं हैं।’
(कनखियाँ इशारे, फिर कनखी)
बाक़ी कहानी बस कनखी है।
हे परमपिताओं,
परमपुरुषों–
बख्शो, बख्शो, अब हमें बख्शो!
Anamika
2.
तुम स्वीकार करते हो
लिप्साओं के संसार में तुम एक ययाति
याचक
प्रेमी
पति
पिता भी तो हो तुम
तुम्हारा स्वार्थ एक कायांतर पुरु की देह से गुज़रते हुए
शर्मिष्ठा तक !
मैं स्वीकार करती हूँ तुम्हारा अपरिमित स्नेह जैसे "बुद्ध"
मेरी अधीरता के महल से बाहर गमन करता
दुखों को मांजता
अतियों के दुर्निवार जंगल में
सरल रास्ता
जिस पर चल सके आम्रपाली .
हम दो ..
कई अंतर विरोधों में जीते -मरते
अंतत: उस बिंदु पर रुक जाते हैं सहसा
जहाँ से मैं टकटकी लगाये देखती हूँ
अपने भीतर का सुन्दरतम पुरुष कमियों के साथ
और तुम ठगे से चाहते हो भरपूर एक स्त्री मौन में प्रतिवाद करती
अपने भीतर गहन .
अहम् की स्लेटों की अदला -बदली करते
दोनों की निश्छल हंसी और निश्चिन्तता सहज हो लिखती है
सान्द्र प्रेम ..
सूख -सूख पट्टी
चन्दन घट्टी...
बीत चुकी है मावट की बरसात
सूख रही हैं हमारी छोटी -छोटी स्वीकृतियां गुनगुनी धूप में बाहर
कितनी पूरक ..
अपर्णा manoj
3.
ओह बहुरूपिये पुरुष !
पति
एक दिन
तुम्हारा ही अनुगमन करते हुए
मैं उन घटाटोप अँधेरे रास्तो पर भटक गई
निष्ठा के गहरे गह्वर में छिपे आकर्षण के सांप ने मुझे भी डस लिया था
उसके विष का गुणधर्म वैसा ही था
जो पति पत्नी के बीच विरक्ति पैदा कर दे
इतनी
कि दोनों एक दूसरे के मरने की कामना करने लगें.
तभी जान पाई मै कि क्या अर्थ होता है ज़ायका बदल लेने का
और विवाह के बाद के प्रेम में कितना सुख छिपा होता है
और तुम क्यों और कहाँ चले जाते हो बार बार मुझे छोड़कर ..
मैं तुम्हारे बच्चो की माँ थी
कुल बढ़ाने वाली बेल
और अर्धांगिनी
तुम लौट आये भीगे नैनों से हाथ जोड़ खड़े रहे द्वार
तुम जानते थे तुम्हारा लौटना मेरे लिए वरदान होगा
और मैं इसी की प्रतीक्षा में खड़ी मिलूंगी
मेरे और तुम्हारे बीच
फन फैलाये खड़ा था कालिया नाग
और इस बार
मैं चख चुकी थी स्वाद उसके विष का
यह जानने के बाद
तुम
थे पशु ...
मै वैश्या दुराचारिणी ..
ओ प्रेमी!
भटकते हुए जब मैं पहुंची तुम्हारे द्वार
तुमने फेका फंदा
वृन्दावन की संकरी गलियों के मोहपाश का
जिनकी आत्मीयता में खोकर
मैंने सपनो के निधिवन को बस जाने दिया था घर की देहरी के बाहर
गर्वीली नई धरती पर प्यार की फसलों का वैभव फूट रहा था
तुमने कहा
राधा !
राधा ही हो तुम..
और
प्रेम पाप नही..
जब जब
पति से प्रेमी बनता है पुरुष
पाप पुन्य की परिभाषा बदल जाती है
देह आत्मा
और
स्त्री
वैश्या से राधा बन जाती है..
-लीना मल्होत्रा
Sunday, February 24, 2013
अपनी भतीजी पाखी के नाम
(अपनी भतीजी पाखी के नाम )
मत रम मेरी बच्ची मत रम
फैशन की
इस अन्धेरी दुनिया में
मत रम
ये तुझे दफ्न कर देंगे
जिन्दा
उस कब्रगाह में जो इसी रास्ते
जाता है
मैं तुझे कलम देती हूं
और कुछ किताबें
जो तुझे अवसर देंगे
नये सूरज में
नये तरीके से संवरने के
ले ये हथियार और लिख
नयी इबारतें
पुरानी कब्रगाह में दबी
कुछ जिन्दगियों के नाम
और बदल डाल सारे नक्शे
अपनी जिन्दगी के
...........................अलका
मत रम मेरी बच्ची मत रम
फैशन की
इस अन्धेरी दुनिया में
मत रम
ये तुझे दफ्न कर देंगे
जिन्दा
उस कब्रगाह में जो इसी रास्ते
जाता है
मैं तुझे कलम देती हूं
और कुछ किताबें
जो तुझे अवसर देंगे
नये सूरज में
नये तरीके से संवरने के
ले ये हथियार और लिख
नयी इबारतें
पुरानी कब्रगाह में दबी
कुछ जिन्दगियों के नाम
और बदल डाल सारे नक्शे
अपनी जिन्दगी के
...........................अलका
Thursday, February 21, 2013
कवि नरेश सक्सेना की कुछ पंक्तियां और मेरी कलम की गुस्ताखी
मेरे कवि मित्र प्रेम चन्द गान्धी ने नरेश सक्सेना जी की यह् कविता फेसबुक पर कुछ इन विचारों के साथ शेयर की थी :: मेरे प्रिय कवि आदरणीय नरेश सक्से ना की यह कविता पढ़कर भीतर तक हिल गया हूं... कई दिनों से ऐसी ही एक कविता के बिंब ज़ेहन में तैर रहे थे... अब लगता है उसे लिखने की कोई ज़रूरत नहीं। ::
मित्रों, इस कविता पर कुछ लिखने से पहले मैं यह बता दूं कि इस कविता की लयबद्धता , शब्द , साहित्य , लक्षणा व्यंजना मेरी आलोचना का केन्द्र नहीं है बल्कि मेरे लिये इस कविता का केन्द्र बिन्दु स्त्री, उसकी सामाजिक स्थिति. पुरुष वर्चस्व साथ ही स्त्री आज तक जो लिखी गयी है, स्त्री जो आज तक धर्म और समाज में जो बांची गयी है, वह जिस तरह से तैयार की गयी, उसके मानसिक जगत को जिस तरह से गढने की कोशिश रही है, जिन प्रक्रियाओं से वह गुजरी है ......वह है. मिलाकर कहूं तो मैं इस कविता के सामाजिक पक्ष को लिखने की कोशिश कर रही हूं.
नरेश जी की यह कविता कुछ इस तरह है -
मीनोपाज के निकट पहुंचती स्त्रियों को
डराते हैं धर्मग्रंथ
जिनमें स्त्रियों को
पुरुषों की खेतियां बताया जाता है
स्त्रियां जानती हैं
बंजर ज़मीनों का हश्र, जिन्हेंग
उनके मालिक
बेच देना चाहते हैं
लेकिन ग्राहक ढूंढ़े नहीं मिलता
…………………….नरेश सक्सेना
सच कहूं तो यह कविता पढ कर मैं बेहद हैरान हूं. इतनी हैरान कि इस कविता की कुल जमा 8 लाइनों को मैं हज़ार बार पढ चुकी हूं और सोच रही हूं कि नरेश सक्सेना ने यह कविता किस मनोदशा में लिखी होगी ? एक स्त्री होने के नाते मुझे नरेश सक्सेना की कविता और उसके विषय से नाइत्तफाकी है. और हैरानी से सोच रही हूं कि कभी किसी महिला ने पुरुष के मेनोपाज़ पर कविता लिखने की हिम्मत की है? क्या कभी उसने इस सम्बन्ध में धर्म को समझने की कोशिश की है ? .... और क्या उसी दखल और विश्वास से किसी स्त्री ने भी इस विषय को सबके साथ साझा किया है जिस विश्वास से नरेश जी ने किया है? अगर कभी किया है तो क्या उसे उतना समर्थन और उत्कृष्ट कमेंट पुरुषों की तरफ से मिले हैं जैसे कि इस कविता पर देखने को मिले ? वैसे मुझे याद नहीं आता कि कोई ऐसी कविता मेरी नज़रों से गुजरी है अब तक ..........
बहर हाल मेरी हैरानी की कुछ और भी वजहें हैं ......मैं बडी हैरानी से सोच रही हूं कि एक पुरुष कितने दखल के साथ एक स्त्री ही नहीं बल्कि स्त्रियों की दुनिया के विषय में लिखता है, कितने दखल से स्त्री और उसकी दुनिया को जानने की बात करता है , कितने विश्वास से वह अपनी समझ, स्त्रियों के सम्बन्ध में अपने ज्ञान को दुनिया में बांटता है.मुझे हैरानी इस बात से भी है कि उसे अपनी समझ, अपने ज्ञान पर किस कदर भरोसा है ................और हैरान इसलिये भी हूं कि पुरुष और उसकी कलम स्त्री पर किस हद तक और किस तरह नज़र रखती है. मेरी हैरानी यहीं खत्म नहीं होती यह और भी बहुत से मसलों पर कायम रहती है............यह हैरानी स्त्री को तब तक होती रहेगी जब तक उसके विषय में लिखा जाने वाला हर शब्द उसके भावों से सही अर्थों में मेल नहीं खायेगा.
......इन तमाम प्रश्नों और कौतूहल के बाद भी यह कविता अपने समस्त भावों के साथ पूरा ध्यान खींचती है. ध्यान खीचने की कई वज़हें है –
• यह मेरी जैसी महिला को यह कहने के लिये मजबूर करती है कि कविता स्त्री की दयनीयता को दर्शाने के बहाने ही सही पुरुष , पुरुष वाद और धर्म के साथ पुरुष के सम्बन्ध पर बात करती है ,
• दूसरे स्त्री की दयनीयता उसके दुख को सबके सामने लाने की कोशिश करती है
• यह पुरुष उसके स्वभाव , उसकी नज़र में स्त्री , स्त्री पर उसके वर्चस्व पर बात करती है
• सबसे महत्व्पूर्ण है कि वह इन तीनो स्त्री, पुरुष और धर्म तीनो के अंतर सम्बन्धों पर बात करती है.
• साथ ही साथ यह स्त्रियों की आधी आबादी के प्रति पुरुषों की आबादी की समझ उसकी दुनिया से अज्ञानता भी दिखाती है
मैं यह नहीं जानती कि नरेश सक्सेना जी स्त्री की दुनिया को कितना जानते हैं , कितना समझते है, मैं ये भी नहीं जानती कि उनका स्त्री को लेकर दृष्टि कोण क्या है, उन्होने क्यों बंजर स्त्री की दशा का इस तरह चित्रण किया... किंतु यह कविता अगर पुरुष की दुनिया का स्त्री की दुनिया की समझ और उसकी स्थिति को दर्शाने के लिये है तो तो निश्चय ही कविता कवि के स्त्री की दुनिया की कम जानकारी होने का खुलासा भी करती है. मेरे यह कहने का अपना पर्याप्त कारण और समझ है. अगर मैं कहूं कि एक स्त्री होने के नाते
• स्त्री होने की अपनी स्वानुभूति है
• स्त्रियों की दुनिया की बेहतर समझ है
• मीनोपाज जैसे मसलों पर स्त्रियों की राय जानने का दावा है
• तो शायद मैं ना तो गलत हूं और ना ही मेरी गुस्ताखी है क्योंकि स्वयम स्त्री होने के साथ् लम्बे समय से स्त्रियों के बीच काम करते हुए स्त्री की दुनिया को कमोबेश कवि से बेहतर जानने के दावा तो कर ही सकती हूं
• और अगर यह दावा करती हूं तो मीनोपाज के सम्बन्ध में निम्न बात भी दावे के साथ कह सकती हूं
‘’स्त्रियों के साथ सामाजिक क्षेत्र में काम के 20 साल के अपने अनुभव और ज्ञान को अगर मैं इस कविता के बहाने साझा करूं तो मेरा अनुभव मेनोपाज़ से गुजर रही महिलाओं के सम्बन्ध में बिल्कुल इतर है या यूं कहें कि ठीक इसके विपरीत है. बेतुल की उन अनपढ आदिवासी महिलाओं से लेकर दिल्ली की पढी लिखी विद्वान महिलाओं सहित किसी भी 45 से 50 की उमर की महिला जो मासिक धर्म छूटने के कगार पर है को दुखी होते नहीं देखा. ना ही धर्म से घबराते और डरते देखा है. मैने अधिकतर स्त्रियां इसे स्त्री जीवन के मुक्ति काल के रूप में देखती हैं........
मेनोपाज स्त्री जीवन का एक महत्व्पूर्ण काल होता है जिससे गुजरते हुए वह शारीरिक तौर पर जरूर थोडी कठिनाई महसूस करती है किंतु स्त्री के जीवन की बहुतेरी वर्जनायें इस पडाव तक आते आते खत्म हो जाती हैं इसलिये इस दौर में देखा जाये तो वह ना तो धर्म से डरती है और ना ही समाज से.........इस काल तक आते आते वह घर, घर के पदानुक्रम और व्यक्तिगत रूप से कहीं अधिक मुखर हो जाती है. तो जहां तक मीनोपाज पर बात है मेरे मन में स्त्री के इस चक्र को लेकर कवि के अनुभव और ज्ञान पर शंका उत्त्पन्न होती है.
देखिये नरेश जी का पहला बन्ध –
मीनोपाज के निकट पहुंचती स्त्रियों को
डराते हैं धर्मग्रंथ
जिनमें स्त्रियों को
पुरुषों की खेतियां बताया जाता है
किंतु इस कविता का सबसे सकारात्मक पक्ष है इस कविता स्त्री की दयनीयता के बहाने पुरुष की दुनिया के सच को सामने रखना. आप देखें की कविता सभी जगह स्त्री के जीवन उसके जीवन के महत्व पूर्ण प्राकृतिक पडाव पर बात करती है वहीं दूसरी तरफ वह यह भी रहस्य खोलती है कि इस संसार में स्त्री क्या है ? वह इस दुनिया में खुद नहीं डरती .....उसे डराने के लिये , उसे सहमा कर रखने के लिये पुरुष और उसके वाद ने मिलकरएका बनया हुआ है और वह एका धर्म जैसी एक चीज है ......... मजे की बात है कि यह धर्म नाम की चीज़ को विश्वास के साथ जोडा गया है और स्त्री को जबरन इसपर विश्वास करने के लिये बाध्य किया गया...... उन्हें कई मसलों पर रस्सियों पर गतर गतर कर बान्धा गया और उनके द्वारा ना माने जाने की स्थिति में जो उपबन्ध किये गये ...वह ना केवल सोच में डराने वाले रहे बल्कि उस डर को सामाजिक जीवन का हिस्सा बनाया गया ....... और यही कारण है कि नरेश जी कहते हैं मीनोपाज के निकट पहुंचती स्त्रियों को डराते हैं धर्मग्रंथ .........किंतु तमाम डर , टमाम भय के बाद भी स्त्री की दुनिया का अपना एक सच है .....स्त्री की दुनिया की अपनी एक खुशी है .और अपना एक मन ....सही जो ना तो धर्म से संचालित होता है ना ही किसी ग्रंथ से ..........उसकी खुशी को किसी ने अभी तक जाना ही नहीं और उसके सही दुख को भी .........
अब अगर धर्म पर आधारित उपबन्धों को देखा जाये तो दुनिया भर के सभी धर्मग्रंथ सभी स्त्रियों के लिये बहुत से उपबन्ध लिखते हैं किंतु धर्म के अधिक डराने वाले उपबन्ध रजस्वला स्त्री के लिये हैं ‘जिनमें स्त्रियों को पुरुषों की खेतियां बताया जाता है. किंतु कविता की यह दूसरी पंक्ति पूरे पुरुष समाज, उसके वाद और धर्म से उसके अंतर सम्बन्ध को बयान करती है और सोचने को मजबूर करती है कि आखिर यह पुरुष है कौन ? स्त्री कैसे उसकी खेती हो सकती है ?इस कविता के बहाने मैं यह सोच रही हूं कि --
कौन है पुरुष ? कैसे हुआ पुरुष और पुरुष वाद का उद्भव और विकास ? क्या यह एक सहज़ उद्धभव और विकास था या फिर एक रणनीति के तहत किया गया विकास था? अगर यह एक सहज़ विकास था तो फिर यह समाज पर इतना हावी और प्रभावी कैसे हो गया ? क्या पुरुष वाद और धर्म एक दूसरे के पूरक का काम करते हैं? अगर यह पूरक है तो क्या पुरुष और धर्म दोनो ही स्त्री, स्त्री वादी और स्त्री समर्थकों के विरुद्ध हैं ? या फिर उन सबके विरुद्ध जो पुरुष और पुरुषवाद के आलोचक हैं?
सोच रही हूं कि ‘पुरुष’ यह शब्द रोज सुना जाने वाला एक जाना पहचाना शब्द है. एक ऐसा शब्द जिसे हम अपने जीवन से जुडा शब्द समझते हैं. सैधांतिक रूप से इस शब्द की व्याख्या जब जब और जहां जहां की गयी है एक मानव नर रूप की कल्पना ही की गयी है जो बलिष्ठ है, जो अपराजेय है, बुद्धिमान है मतलब इस शब्द के साथ शारीरिक सौष्ठव, बल, वर्चस्व , और विराट का एक ऐसा मिश्रित रूप गढा गया है जो एक अपराजेय नर की ही कल्पना को मूर्त करता है. इस असाधारण नर की कलपना और उसके द्वारा सम्पादित सभी कार्यों को भी कार्य की उत्तम श्रेणी में रखा गया. इस तरह इस नर ‘पुरुष’ द्वारा सम्पादित कार्य को उसका ‘पौरुष’ कहा गया. विराट पुरुष की यह परिकल्पना सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया के हर समाज, हर देश, जाति, वर्ग औत क्षेत्र में किसी ना किसी रूप में की गयी है. विराट पुरुष की इस परिकल्पना में दुनिया के सभी धर्म अद्भुत रूप से समान नज़र आते हैं. इस कल्पना को दुनिया के सभी समाज एक खास तरह के सम्मान और प्रतिष्ठा से नवाज़ते हैं. किंतु आश्चर्य जनक यह है कि विराट पुरुष की इस परिकल्पना के साथ किसी ऐसी विराट स्त्री की परिकल्पना नहीं की गयी विराट पुरुष की इस व्याख्या को पढने पर कुछ बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न दिमाग में आते हैं और वो प्रश्न अपना समुचित जवाब मांगते हैं. पहला प्रश्न जो मन को उद्वेलित करत है वो है कि इस अपराजेय, बलिष्ठ और बुद्धिमान नर के सम्बन्ध में पुरुष’ और पौरुष’ की यह परिकलपना सृष्टि के आरम्भ से ही थी ? दूसरा जो मतव्पूर्ण प्रश्न दिमाग को कुरेदता है वह यह कि आखिर इस मानव समाज में नर की प्रधानता की कल्पना क्यों और किन परिस्थितियों में की गयी ? और सबसे महत्व्पूर्ण प्रश्न कि जब इस विराट नर की यह कल्पना की जा रही थी, जब यह कल्पना समाज में आरोपित हो रही थी तब स्त्रियां कहां थीं और वह इस पुरुष की कल्पना और समाज में इसकी स्थापना को किस रूप में ले रही थीं ? देखा जाय तो विराट पुरुष की परिकल्पना के विषय में उपरोक्त सभी प्रश्न जायज़ प्रश्न हैं और गहरे पड्ताल की मांग करते हैं किंतु वहीं दूसरी तरफ इस पुरुष के विराट, उसके पौरुष की व्याख्या और उसके शारीरिक सौष्ठव के विषद वर्णन दुनिया के सभी धर्न ग्रंथों में किसी ना किसी रूप में भरे पडे हैं. सवाल यह भी कि यदि यह ग्रंथ ईश्वर ने नहीं लिखे जैसा कि जाहिर है कि उसने नहीं लिखे तब यह ग्रंथ लिखे किसने हैं ? यह ग्रंथ क्यों लिखा गया ? इस तरह के बहुतेरे सवाल मन में उठते हैं और उन सवालों की पडताल करते करते जो सिरा निष्कर्ष तक पहुंचता है कि क्या धर्म और पुरुष दोनो ने मिलकर स्त्री को पुरुषों की दासी बनाने का काम किया है ? तो इसका मतलब कोई भी धर्म ग्रंथ अपौरुषेय नहीं है. कोई भी धर्म ग्रंथ आसमानी किताब नहीं है. यह पुरुषों के द्वारा स्त्री को नियंत्रित करने का जरिया है. बहर हाल यह कविता यह उत्तेजना पैदा करने में सफल है कि मैं इस हद तक सोचू , समझूं और दुनिया से साझा करूं और यही इस कविता की विशेषता है. कारण यह कि यह कविता किसी भी सजग और चिंतंनशील स्त्री को इसी तरह सोचने को मजबूर करेगी.
कविता का दूसरा बन्ध पूरी तरह स्त्री की सामाजिक स्थिति की बात करती है. दूसरा बन्ध कहता है –
स्त्रियां जानती हैं
बंजर ज़मीनों का हश्र, जिन्हें
उनके मालिक
बेच देना चाहते हैं
लेकिन ग्राहक ढूंढ़े नहीं मिलता
कविता का यह दूसरा हिस्सा पढते हुए भी मन कवि से सवाल करने को कहता है. कई ऐसे सवाल जो कविता के अंतर से निकल कर चिल्लाते हैं. सोचती हूं कि स्त्री और पृथवी में साम्य अवश्य हैं किंतु उतने ही गहरे विभेद भी ....स्त्रियां अगर बंजर जमीनों का हश्र जानती हैं तो अपने होने का अर्थ भी तो जानती हैं.. तो क्या कविता का यह बन्द स्त्री की लाचारगी भर बयान करती है ? किंतु मैं इन पंक्तियों को मीनोपाज से बंजर हुई महिलाओं के सम्बन्ध में समग्र रूप से नहीं देख पा रही. लेकिन सोच रही हूं कि यह कविता एक पुरुष की कलम से निकली हुई कविता है जहां स्त्री के सम्बन्ध में पुरुष के मन, पुरुष के समाज उसकी स्त्री के प्रति उसकी भावना को समझने की कोशिश की जा सकती है............ऐसा इसलिये क्योंकि तमाम लाचारियों के बाद भी स्त्री को अपने होने का सच पता है, उसे परिवार में अपने होने का अर्थ पता है. वह मीनोपाज के करीब पहुंच कर अपनी एक दुनिया अपने जीवन के संघर्ष से रच चुकी होती है......अगर स्त्री अकेली है तो भी वह इस काल तक आते आते अपना एक जीवन जी चुकी होती है ....... इसलिये अपनी भूमिका भी उसे पता है तो ऐसे में उसका पति जो अपने सारे अर्थों में पुरुष है उसे अन्य मालिक हो सौंप देगा इस तरह की कोई व्यवस्था किसी समाज में होगी इसपर प्रश्न चिन्ह है ............यदि स्त्री एक ऐसे पेशे में है जो सेक्स पर आधारित है तब भी वह इस दौर तक आते आते ऐसी स्थिति में कम ही रह जाती है कि उसे कोई बेच सके ............... तो कविता की इन पंक्तियों को मैं कुछ इस तरह से समझने के प्रयास में हूं ............ दुनिया भर में आज तक जो भी लिखा गया और समझा गया है वह पुरुष की नज़र से, उसकी कलम से , उसकी कलम ने स्त्री को स्त्री बनाया है, उसके लिये बिम्ब गढे हैं , उसकी परिवार और समाज में भूमिका बतायी है, स्त्री को कई खानों में बांटा, अच्छी –बुरी स्त्री बनायी , यह तय किया है कि वो किन स्थितियों में खुश रहेगी, कब डरेगी , कब हंसेगी. दुनिया भर की सभी प्रेम कवितायें उसकी नज़र से लिखी गयी है, उसके डर क्या हैं ये उसकी कलम ने बयान किये हैं. तो सही मायनों में देखा जाये तो स्त्री का दिमाग , उसका मन और उसके रहने , जीने और तमाम भावों की स्थितियां पुरुष ने ही तैयार की हैं ऐसे में पुरुसः यह कैसे जान सकता है कि स्त्री का अपना स्वतंत्र मन क्या है और वह किन बातों पर वास्तव में खुश और दुखी होती है ...........धर्म के तमाम उपबन्धों और दबावों के बाद भी स्त्री का मन जिन बातों पर खुश होता है वह इस बारे में खुद लिखे गी ...........क्योंकि उसका ग्रंथ जिसे वह धर्म कहेगी वह लिखा जाना अभी बाकी है ................
इसलिये सही मायनों में बंजर होने का दुख स्त्री का नहीं पुरुष और उसके समाज का है. कहीं ना कहीं उसे अपना बंजर काल भी याद आता है किंतु वह और उसका ग्रंथ दोनो मिलकर स्त्री के बंजर काल को रेखांकित करते हैं. पुरुष के लिये स्त्री का बंजर काल भले ही काम की चीज़ ना हो लेकिन हर स्त्री का अपना जीवन उसके लिये खुशी का सबब तो है.
कुलमिलाकर देखा जाये तो यह कविता स्त्री के दुख से अधिक पुरुष मन, उसके अंदर के भय और उसके वाद के सच को बेहतर खोलती है.
अलका
मित्रों, इस कविता पर कुछ लिखने से पहले मैं यह बता दूं कि इस कविता की लयबद्धता , शब्द , साहित्य , लक्षणा व्यंजना मेरी आलोचना का केन्द्र नहीं है बल्कि मेरे लिये इस कविता का केन्द्र बिन्दु स्त्री, उसकी सामाजिक स्थिति. पुरुष वर्चस्व साथ ही स्त्री आज तक जो लिखी गयी है, स्त्री जो आज तक धर्म और समाज में जो बांची गयी है, वह जिस तरह से तैयार की गयी, उसके मानसिक जगत को जिस तरह से गढने की कोशिश रही है, जिन प्रक्रियाओं से वह गुजरी है ......वह है. मिलाकर कहूं तो मैं इस कविता के सामाजिक पक्ष को लिखने की कोशिश कर रही हूं.
नरेश जी की यह कविता कुछ इस तरह है -
मीनोपाज के निकट पहुंचती स्त्रियों को
डराते हैं धर्मग्रंथ
जिनमें स्त्रियों को
पुरुषों की खेतियां बताया जाता है
स्त्रियां जानती हैं
बंजर ज़मीनों का हश्र, जिन्हेंग
उनके मालिक
बेच देना चाहते हैं
लेकिन ग्राहक ढूंढ़े नहीं मिलता
…………………….नरेश सक्सेना
सच कहूं तो यह कविता पढ कर मैं बेहद हैरान हूं. इतनी हैरान कि इस कविता की कुल जमा 8 लाइनों को मैं हज़ार बार पढ चुकी हूं और सोच रही हूं कि नरेश सक्सेना ने यह कविता किस मनोदशा में लिखी होगी ? एक स्त्री होने के नाते मुझे नरेश सक्सेना की कविता और उसके विषय से नाइत्तफाकी है. और हैरानी से सोच रही हूं कि कभी किसी महिला ने पुरुष के मेनोपाज़ पर कविता लिखने की हिम्मत की है? क्या कभी उसने इस सम्बन्ध में धर्म को समझने की कोशिश की है ? .... और क्या उसी दखल और विश्वास से किसी स्त्री ने भी इस विषय को सबके साथ साझा किया है जिस विश्वास से नरेश जी ने किया है? अगर कभी किया है तो क्या उसे उतना समर्थन और उत्कृष्ट कमेंट पुरुषों की तरफ से मिले हैं जैसे कि इस कविता पर देखने को मिले ? वैसे मुझे याद नहीं आता कि कोई ऐसी कविता मेरी नज़रों से गुजरी है अब तक ..........
बहर हाल मेरी हैरानी की कुछ और भी वजहें हैं ......मैं बडी हैरानी से सोच रही हूं कि एक पुरुष कितने दखल के साथ एक स्त्री ही नहीं बल्कि स्त्रियों की दुनिया के विषय में लिखता है, कितने दखल से स्त्री और उसकी दुनिया को जानने की बात करता है , कितने विश्वास से वह अपनी समझ, स्त्रियों के सम्बन्ध में अपने ज्ञान को दुनिया में बांटता है.मुझे हैरानी इस बात से भी है कि उसे अपनी समझ, अपने ज्ञान पर किस कदर भरोसा है ................और हैरान इसलिये भी हूं कि पुरुष और उसकी कलम स्त्री पर किस हद तक और किस तरह नज़र रखती है. मेरी हैरानी यहीं खत्म नहीं होती यह और भी बहुत से मसलों पर कायम रहती है............यह हैरानी स्त्री को तब तक होती रहेगी जब तक उसके विषय में लिखा जाने वाला हर शब्द उसके भावों से सही अर्थों में मेल नहीं खायेगा.
......इन तमाम प्रश्नों और कौतूहल के बाद भी यह कविता अपने समस्त भावों के साथ पूरा ध्यान खींचती है. ध्यान खीचने की कई वज़हें है –
• यह मेरी जैसी महिला को यह कहने के लिये मजबूर करती है कि कविता स्त्री की दयनीयता को दर्शाने के बहाने ही सही पुरुष , पुरुष वाद और धर्म के साथ पुरुष के सम्बन्ध पर बात करती है ,
• दूसरे स्त्री की दयनीयता उसके दुख को सबके सामने लाने की कोशिश करती है
• यह पुरुष उसके स्वभाव , उसकी नज़र में स्त्री , स्त्री पर उसके वर्चस्व पर बात करती है
• सबसे महत्व्पूर्ण है कि वह इन तीनो स्त्री, पुरुष और धर्म तीनो के अंतर सम्बन्धों पर बात करती है.
• साथ ही साथ यह स्त्रियों की आधी आबादी के प्रति पुरुषों की आबादी की समझ उसकी दुनिया से अज्ञानता भी दिखाती है
मैं यह नहीं जानती कि नरेश सक्सेना जी स्त्री की दुनिया को कितना जानते हैं , कितना समझते है, मैं ये भी नहीं जानती कि उनका स्त्री को लेकर दृष्टि कोण क्या है, उन्होने क्यों बंजर स्त्री की दशा का इस तरह चित्रण किया... किंतु यह कविता अगर पुरुष की दुनिया का स्त्री की दुनिया की समझ और उसकी स्थिति को दर्शाने के लिये है तो तो निश्चय ही कविता कवि के स्त्री की दुनिया की कम जानकारी होने का खुलासा भी करती है. मेरे यह कहने का अपना पर्याप्त कारण और समझ है. अगर मैं कहूं कि एक स्त्री होने के नाते
• स्त्री होने की अपनी स्वानुभूति है
• स्त्रियों की दुनिया की बेहतर समझ है
• मीनोपाज जैसे मसलों पर स्त्रियों की राय जानने का दावा है
• तो शायद मैं ना तो गलत हूं और ना ही मेरी गुस्ताखी है क्योंकि स्वयम स्त्री होने के साथ् लम्बे समय से स्त्रियों के बीच काम करते हुए स्त्री की दुनिया को कमोबेश कवि से बेहतर जानने के दावा तो कर ही सकती हूं
• और अगर यह दावा करती हूं तो मीनोपाज के सम्बन्ध में निम्न बात भी दावे के साथ कह सकती हूं
‘’स्त्रियों के साथ सामाजिक क्षेत्र में काम के 20 साल के अपने अनुभव और ज्ञान को अगर मैं इस कविता के बहाने साझा करूं तो मेरा अनुभव मेनोपाज़ से गुजर रही महिलाओं के सम्बन्ध में बिल्कुल इतर है या यूं कहें कि ठीक इसके विपरीत है. बेतुल की उन अनपढ आदिवासी महिलाओं से लेकर दिल्ली की पढी लिखी विद्वान महिलाओं सहित किसी भी 45 से 50 की उमर की महिला जो मासिक धर्म छूटने के कगार पर है को दुखी होते नहीं देखा. ना ही धर्म से घबराते और डरते देखा है. मैने अधिकतर स्त्रियां इसे स्त्री जीवन के मुक्ति काल के रूप में देखती हैं........
मेनोपाज स्त्री जीवन का एक महत्व्पूर्ण काल होता है जिससे गुजरते हुए वह शारीरिक तौर पर जरूर थोडी कठिनाई महसूस करती है किंतु स्त्री के जीवन की बहुतेरी वर्जनायें इस पडाव तक आते आते खत्म हो जाती हैं इसलिये इस दौर में देखा जाये तो वह ना तो धर्म से डरती है और ना ही समाज से.........इस काल तक आते आते वह घर, घर के पदानुक्रम और व्यक्तिगत रूप से कहीं अधिक मुखर हो जाती है. तो जहां तक मीनोपाज पर बात है मेरे मन में स्त्री के इस चक्र को लेकर कवि के अनुभव और ज्ञान पर शंका उत्त्पन्न होती है.
देखिये नरेश जी का पहला बन्ध –
मीनोपाज के निकट पहुंचती स्त्रियों को
डराते हैं धर्मग्रंथ
जिनमें स्त्रियों को
पुरुषों की खेतियां बताया जाता है
किंतु इस कविता का सबसे सकारात्मक पक्ष है इस कविता स्त्री की दयनीयता के बहाने पुरुष की दुनिया के सच को सामने रखना. आप देखें की कविता सभी जगह स्त्री के जीवन उसके जीवन के महत्व पूर्ण प्राकृतिक पडाव पर बात करती है वहीं दूसरी तरफ वह यह भी रहस्य खोलती है कि इस संसार में स्त्री क्या है ? वह इस दुनिया में खुद नहीं डरती .....उसे डराने के लिये , उसे सहमा कर रखने के लिये पुरुष और उसके वाद ने मिलकरएका बनया हुआ है और वह एका धर्म जैसी एक चीज है ......... मजे की बात है कि यह धर्म नाम की चीज़ को विश्वास के साथ जोडा गया है और स्त्री को जबरन इसपर विश्वास करने के लिये बाध्य किया गया...... उन्हें कई मसलों पर रस्सियों पर गतर गतर कर बान्धा गया और उनके द्वारा ना माने जाने की स्थिति में जो उपबन्ध किये गये ...वह ना केवल सोच में डराने वाले रहे बल्कि उस डर को सामाजिक जीवन का हिस्सा बनाया गया ....... और यही कारण है कि नरेश जी कहते हैं मीनोपाज के निकट पहुंचती स्त्रियों को डराते हैं धर्मग्रंथ .........किंतु तमाम डर , टमाम भय के बाद भी स्त्री की दुनिया का अपना एक सच है .....स्त्री की दुनिया की अपनी एक खुशी है .और अपना एक मन ....सही जो ना तो धर्म से संचालित होता है ना ही किसी ग्रंथ से ..........उसकी खुशी को किसी ने अभी तक जाना ही नहीं और उसके सही दुख को भी .........
अब अगर धर्म पर आधारित उपबन्धों को देखा जाये तो दुनिया भर के सभी धर्मग्रंथ सभी स्त्रियों के लिये बहुत से उपबन्ध लिखते हैं किंतु धर्म के अधिक डराने वाले उपबन्ध रजस्वला स्त्री के लिये हैं ‘जिनमें स्त्रियों को पुरुषों की खेतियां बताया जाता है. किंतु कविता की यह दूसरी पंक्ति पूरे पुरुष समाज, उसके वाद और धर्म से उसके अंतर सम्बन्ध को बयान करती है और सोचने को मजबूर करती है कि आखिर यह पुरुष है कौन ? स्त्री कैसे उसकी खेती हो सकती है ?इस कविता के बहाने मैं यह सोच रही हूं कि --
कौन है पुरुष ? कैसे हुआ पुरुष और पुरुष वाद का उद्भव और विकास ? क्या यह एक सहज़ उद्धभव और विकास था या फिर एक रणनीति के तहत किया गया विकास था? अगर यह एक सहज़ विकास था तो फिर यह समाज पर इतना हावी और प्रभावी कैसे हो गया ? क्या पुरुष वाद और धर्म एक दूसरे के पूरक का काम करते हैं? अगर यह पूरक है तो क्या पुरुष और धर्म दोनो ही स्त्री, स्त्री वादी और स्त्री समर्थकों के विरुद्ध हैं ? या फिर उन सबके विरुद्ध जो पुरुष और पुरुषवाद के आलोचक हैं?
सोच रही हूं कि ‘पुरुष’ यह शब्द रोज सुना जाने वाला एक जाना पहचाना शब्द है. एक ऐसा शब्द जिसे हम अपने जीवन से जुडा शब्द समझते हैं. सैधांतिक रूप से इस शब्द की व्याख्या जब जब और जहां जहां की गयी है एक मानव नर रूप की कल्पना ही की गयी है जो बलिष्ठ है, जो अपराजेय है, बुद्धिमान है मतलब इस शब्द के साथ शारीरिक सौष्ठव, बल, वर्चस्व , और विराट का एक ऐसा मिश्रित रूप गढा गया है जो एक अपराजेय नर की ही कल्पना को मूर्त करता है. इस असाधारण नर की कलपना और उसके द्वारा सम्पादित सभी कार्यों को भी कार्य की उत्तम श्रेणी में रखा गया. इस तरह इस नर ‘पुरुष’ द्वारा सम्पादित कार्य को उसका ‘पौरुष’ कहा गया. विराट पुरुष की यह परिकल्पना सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया के हर समाज, हर देश, जाति, वर्ग औत क्षेत्र में किसी ना किसी रूप में की गयी है. विराट पुरुष की इस परिकल्पना में दुनिया के सभी धर्म अद्भुत रूप से समान नज़र आते हैं. इस कल्पना को दुनिया के सभी समाज एक खास तरह के सम्मान और प्रतिष्ठा से नवाज़ते हैं. किंतु आश्चर्य जनक यह है कि विराट पुरुष की इस परिकल्पना के साथ किसी ऐसी विराट स्त्री की परिकल्पना नहीं की गयी विराट पुरुष की इस व्याख्या को पढने पर कुछ बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न दिमाग में आते हैं और वो प्रश्न अपना समुचित जवाब मांगते हैं. पहला प्रश्न जो मन को उद्वेलित करत है वो है कि इस अपराजेय, बलिष्ठ और बुद्धिमान नर के सम्बन्ध में पुरुष’ और पौरुष’ की यह परिकलपना सृष्टि के आरम्भ से ही थी ? दूसरा जो मतव्पूर्ण प्रश्न दिमाग को कुरेदता है वह यह कि आखिर इस मानव समाज में नर की प्रधानता की कल्पना क्यों और किन परिस्थितियों में की गयी ? और सबसे महत्व्पूर्ण प्रश्न कि जब इस विराट नर की यह कल्पना की जा रही थी, जब यह कल्पना समाज में आरोपित हो रही थी तब स्त्रियां कहां थीं और वह इस पुरुष की कल्पना और समाज में इसकी स्थापना को किस रूप में ले रही थीं ? देखा जाय तो विराट पुरुष की परिकल्पना के विषय में उपरोक्त सभी प्रश्न जायज़ प्रश्न हैं और गहरे पड्ताल की मांग करते हैं किंतु वहीं दूसरी तरफ इस पुरुष के विराट, उसके पौरुष की व्याख्या और उसके शारीरिक सौष्ठव के विषद वर्णन दुनिया के सभी धर्न ग्रंथों में किसी ना किसी रूप में भरे पडे हैं. सवाल यह भी कि यदि यह ग्रंथ ईश्वर ने नहीं लिखे जैसा कि जाहिर है कि उसने नहीं लिखे तब यह ग्रंथ लिखे किसने हैं ? यह ग्रंथ क्यों लिखा गया ? इस तरह के बहुतेरे सवाल मन में उठते हैं और उन सवालों की पडताल करते करते जो सिरा निष्कर्ष तक पहुंचता है कि क्या धर्म और पुरुष दोनो ने मिलकर स्त्री को पुरुषों की दासी बनाने का काम किया है ? तो इसका मतलब कोई भी धर्म ग्रंथ अपौरुषेय नहीं है. कोई भी धर्म ग्रंथ आसमानी किताब नहीं है. यह पुरुषों के द्वारा स्त्री को नियंत्रित करने का जरिया है. बहर हाल यह कविता यह उत्तेजना पैदा करने में सफल है कि मैं इस हद तक सोचू , समझूं और दुनिया से साझा करूं और यही इस कविता की विशेषता है. कारण यह कि यह कविता किसी भी सजग और चिंतंनशील स्त्री को इसी तरह सोचने को मजबूर करेगी.
कविता का दूसरा बन्ध पूरी तरह स्त्री की सामाजिक स्थिति की बात करती है. दूसरा बन्ध कहता है –
स्त्रियां जानती हैं
बंजर ज़मीनों का हश्र, जिन्हें
उनके मालिक
बेच देना चाहते हैं
लेकिन ग्राहक ढूंढ़े नहीं मिलता
कविता का यह दूसरा हिस्सा पढते हुए भी मन कवि से सवाल करने को कहता है. कई ऐसे सवाल जो कविता के अंतर से निकल कर चिल्लाते हैं. सोचती हूं कि स्त्री और पृथवी में साम्य अवश्य हैं किंतु उतने ही गहरे विभेद भी ....स्त्रियां अगर बंजर जमीनों का हश्र जानती हैं तो अपने होने का अर्थ भी तो जानती हैं.. तो क्या कविता का यह बन्द स्त्री की लाचारगी भर बयान करती है ? किंतु मैं इन पंक्तियों को मीनोपाज से बंजर हुई महिलाओं के सम्बन्ध में समग्र रूप से नहीं देख पा रही. लेकिन सोच रही हूं कि यह कविता एक पुरुष की कलम से निकली हुई कविता है जहां स्त्री के सम्बन्ध में पुरुष के मन, पुरुष के समाज उसकी स्त्री के प्रति उसकी भावना को समझने की कोशिश की जा सकती है............ऐसा इसलिये क्योंकि तमाम लाचारियों के बाद भी स्त्री को अपने होने का सच पता है, उसे परिवार में अपने होने का अर्थ पता है. वह मीनोपाज के करीब पहुंच कर अपनी एक दुनिया अपने जीवन के संघर्ष से रच चुकी होती है......अगर स्त्री अकेली है तो भी वह इस काल तक आते आते अपना एक जीवन जी चुकी होती है ....... इसलिये अपनी भूमिका भी उसे पता है तो ऐसे में उसका पति जो अपने सारे अर्थों में पुरुष है उसे अन्य मालिक हो सौंप देगा इस तरह की कोई व्यवस्था किसी समाज में होगी इसपर प्रश्न चिन्ह है ............यदि स्त्री एक ऐसे पेशे में है जो सेक्स पर आधारित है तब भी वह इस दौर तक आते आते ऐसी स्थिति में कम ही रह जाती है कि उसे कोई बेच सके ............... तो कविता की इन पंक्तियों को मैं कुछ इस तरह से समझने के प्रयास में हूं ............ दुनिया भर में आज तक जो भी लिखा गया और समझा गया है वह पुरुष की नज़र से, उसकी कलम से , उसकी कलम ने स्त्री को स्त्री बनाया है, उसके लिये बिम्ब गढे हैं , उसकी परिवार और समाज में भूमिका बतायी है, स्त्री को कई खानों में बांटा, अच्छी –बुरी स्त्री बनायी , यह तय किया है कि वो किन स्थितियों में खुश रहेगी, कब डरेगी , कब हंसेगी. दुनिया भर की सभी प्रेम कवितायें उसकी नज़र से लिखी गयी है, उसके डर क्या हैं ये उसकी कलम ने बयान किये हैं. तो सही मायनों में देखा जाये तो स्त्री का दिमाग , उसका मन और उसके रहने , जीने और तमाम भावों की स्थितियां पुरुष ने ही तैयार की हैं ऐसे में पुरुसः यह कैसे जान सकता है कि स्त्री का अपना स्वतंत्र मन क्या है और वह किन बातों पर वास्तव में खुश और दुखी होती है ...........धर्म के तमाम उपबन्धों और दबावों के बाद भी स्त्री का मन जिन बातों पर खुश होता है वह इस बारे में खुद लिखे गी ...........क्योंकि उसका ग्रंथ जिसे वह धर्म कहेगी वह लिखा जाना अभी बाकी है ................
इसलिये सही मायनों में बंजर होने का दुख स्त्री का नहीं पुरुष और उसके समाज का है. कहीं ना कहीं उसे अपना बंजर काल भी याद आता है किंतु वह और उसका ग्रंथ दोनो मिलकर स्त्री के बंजर काल को रेखांकित करते हैं. पुरुष के लिये स्त्री का बंजर काल भले ही काम की चीज़ ना हो लेकिन हर स्त्री का अपना जीवन उसके लिये खुशी का सबब तो है.
कुलमिलाकर देखा जाये तो यह कविता स्त्री के दुख से अधिक पुरुष मन, उसके अंदर के भय और उसके वाद के सच को बेहतर खोलती है.
अलका
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