Friday, April 13, 2012

क्या निर्मला पुतुल के सवाल आदिवासी जीवन के मूल भूत सवाल हैं

(यह लेख एन डी टी वी पर अभिज्ञान प्रकाश के कार्यक्रम, उससे उपजे मंथन और एक तरह की गहरी खीझ जिसे मैं नाराज़गी कह रही हूँ से उपजा है. सच कहूँ तो अभिज्ञान के इस कार्यक्रम में नक्सल वाद, आदिवासी जीवन , उनकी समस्या और मुख्य धारा में उनके ना होने की त्रासदी को जिस तरह से समझा और रखा गया उसने मुझे इस बीमारी की हालत में भी अपने लैपटाप पर बैठने को मजबूर कर दिया. दुर्भाग्य से मैं अभिज्ञान प्रकाश के इस कार्यक्रम को पूरा नहीं देख पायी लेकिन जहाँ से देखा उसने मेरे अन्दर सवालों की जैसे झडी लगा दी. उसने इस देश की कई त्रासदियों को ही नही बल्कि यह भी समझने में मेरी मदद की कि देश की सेना, पुलिस और नेता जनता की समस्या और मांग को कैसे देखते हैं इस पूरी चर्चा ने मुझे निर्मला पुतुल की कई कविताओं की याद दिला दी. खासकर उस कविता की जिसमें वह आदिवासी जमात की तरफ से कुछ सवाल करती हैं और कहती हैं कि : अगर तुम मेरी जगह होते ? )
मित्रों ,
आज मैं गहरी सोच में हूँ. एक तरह की नारज़गी में. बार बार यह समझने की कोशिश में हूँ कि देश का मतलब क्या होता है? नागरिक का मतलब क्या होता है? और यह भी समझने की लगातार कोशिश कर रही हूँ कि क्या एक देश के नागरिक और उसके प्रश्न क्या होने चाहिये? यह भी कि नागरिक सुरक्षा का मतलब क्या है? सालों से यह सवाल मुझे बेतरह परेशान करते रहे हैं किंतु जबसे मैनें आदिवासी जीवन को करीब से देखा है उसे जाना है ये सवाल हर वक्त मेरे जेहन में किसी कीडे की तरह रेंगते रहते हैं कि इस देश में आदिवासी होना क्या आपको पूरी सुरक्षा देता है ? क्या आपके सवालों को दिल्ली दरबार तक पहुंचाता है ? ..........और सच कहूँ तो जब एक आदिवासी के घर में खडे होकर मन में यह सवाल उठते हैं तो मन बडी शिद्द्त से जवाब मांगता है क्योंकि मध्यप्रदेश से लेकर अन्ध्रा तक उत्तर प्रदेश से लेकर उडीसा तक आदिवासी जीवन की त्रासदी एक सी है और सवाल , मांगें और उम्मीदें भी एक सी हैं.......आदिवासी कभी भीख नहीं मांगता, वह मेह्नत करता है और अपने आस पास की प्रकृति का रखवाला है .............ऐसा आदिवासियों का अपने बारे में विचार है किंतु आज़ादी के बाद के 65 साल में इस देश की पूरी जनजाति के जीवन उसकी संस्कृति और सभ्यता के साथ जो कुछ हुआ है उसने आदिवासी जन के मन में मनो सवाल लादे हैं.............. यही वज़ह है कि आदिवासी जन की बात करते हुए मुझे पुतुल की कवितायें बेतरह याद आती हैं............. खासकर तब जब वह सवाल करते हुए कहती हैं कि:
“जरा सोचो, कि
तुम मेरी जगह होते
और मैं तुम्हारी
तो, कैसा लगता तुम्हें?”

मेरा यह हमेशा से मानना रहा है कि इमानदार कवितायें किसी भी बात , भाव या समस्या को बेहतर तरीके से समझने और उसके तह तक जाने का सबसे अच्छा जरिया होती हैं. सच कहूँ तो एन डी टी वी के कल के कार्यक्रम ने मेरी इस अवधारणा में एक और पहलू जोड दिया कि एक देश , उसकी सत्ता और वहाँ की जनता की समस्या को समझने के लिये इमानदार कवियों , लेखकों के लेखन से गुजरना उतना ही जरूरी है जितना कि किसी इलाके में जाकर कर वहाँ के मुद्दों को जानना है. इसी लिये आज मैं निर्मला पुतुल और उनकी एक कविता की बात करूंगी. यह इसलिये नहीं कि मैं उनकी कविता की कोई बहुत महान समीक्षा करूँगी या फिर इसलिये नहीं कि निर्मला पुतुल को एक बहुत महान कवियत्री साबित करने का इरादा है यहाँ मैं उनकी कविता और उसमें उठाये गये मुद्दे को इसलिये रख् रही हूँ क्योंकि कल देश के कुछ ख्यातनाम लोगों ने टी वी के एक् कार्यक्रम में बैठ्कर देश के एक बहुत बडे हिस्से में रहने वाले लोगों की समस्या पर अपनी राय व्यक्त की जिसमें जिसमें इस देश के एक पूर्व सेनाध्यक्ष आदिवासी बहुल इलाके के सम्बन्ध में अपनी राय व्यक्त करते हुए कहते है कि ‘इस पूरे इलाके में आज तक कोई भी पेनीट्रेट नहीं कर पाया है’ मैं संजय निरुपम जो कि एक राष्ट्रीय पार्टी के सदस्य है की भाषा को समझने के प्रयास में हूँ जब वो प्रो. गोपाल को चुप कराने के लहज़े में कहते हैं कि प्रोफेसर साहेब इस तरह के उपदेश ना दें और इसके साथ ही मैं देश की दूसरी बडी पार्टी भाजपा का भी मंतव्य समझने का प्रयास कर रही हूँ क्योंकि इस चर्चा में उनका सुर कांगेस के सुर से अलग नहीं था जबकि वो पार्टी वनवासी आश्रम चलाकर आदिवासी जीवन के बहुत करीब होने का लगातार दावा करती रही है.
देखा जाये तो इस पूरी चर्चा में प्रो. हरगोपाल को छोड्कर चर्चा में भाग लेने वाला कोई भी दिग्गज़ उस बडे हिस्से में रहने वाले लोगों के सवालों का कोई भी जवाब देने में ना केवल अक्षम था बल्कि उन सीधे साधे सवालों के पास भी नहीं पहुंच पाया था . मैं निर्मला की कविता को यहाँ इसलिये रख रही हू क्योंकि आज भी आम आदिवासी के वही सवाल हैं जो निर्मला उठा रही हैं और इन्हीं कुछ मूल प्रश्नो को भी इस चर्चा में रखने का प्रयास किया गया था जिसे एक नेता ने कुछ इस तरह दबाने का प्रयास किया जैसे उस प्रोफेसर ने उन मूल सवालों को उठाकर गुनाह कर दिया हो? पढिये निर्म्मला की कलम से आदिवासी जमात के कुछ मूल सवाल ---------

अगर तुम मेरी जगह होते

जरा सोचो, कि
तुम मेरी जगह होते
और मैं तुम्हारी
तो, कैसा लगता तुम्हें?


कैसा लगता
अगर उस सुदूर पहाड़ की तलहटी में
होता तुम्हारा गाँव
और रह रहे होते तुम
घास-फूस की झोपड़ियों में
गाय, बैल, बकरियों और मुर्गियों के साथ
और बुझने को आतुर ढिबरी की रोशनी में
देखना पड़ता भूख से बिलबिलाते बच्चों का चेहरा तो, कैसा लगता तुम्हें?


कैसा लगता
अगर तुम्हारी बेटियों को लाना पड़ता
कोस भर दूर से ढोकर झरनों से पानी
और घर का चूल्हा जलाने के लिए
तोड़ रहे होते पत्थर
या बिछा रहे होते सड़क पर कोलतार, या फिर
अपनी खटारा साइकिल पर
लकड़ियों का गट्टर लादे
भाग रहे होते बाजार की ओर सुबह-सुबह
नून-तेल के जोगाड़ में!


कैसा लगता, अगर तुम्हारे बच्चे
गाय, बैल, बकरियों के पीछे भागते
बगाली कर रहे होते
और तुम, देखते कंधे पर बैग लटकाए
किसी स्कूल जाते बच्चे को.


जरा सोचो न, कैसा लगता?
अगर तुम्हारी जगह मैं कुर्सी पर डटकर बैठी
चाय सुड़क रही होती चार लोगो के बीच
और तुम सामने हाथ बाँधे खड़े
अपनी बीमार भाषा में रिरिया रहे होते
किसी काम के लिए


बताओं न कैसा लगता ?
जब पीठ थपथपाते हाथ
अचानक माँपने लगते माँसलता की मात्रा
फोटो खींचते, कैमरों के फोकस
होंठो की पपड़ियों से बेखबर
केंद्रित होते छाती के उभारों पर.


सोचो, कि कुछ देर के लिए ही सोचो, पर सोचो,
कि अगर किसी पंक्ति में तुम
सबसे पीछे होते
और मैं सबसे आगे और तो और
कैसा लगता, अगर तुम मेरी जगह काले होते
और चिपटी होती तुम्हारी नाक
पांवो में बिबॉई होती?
और इन सबके लिए कोई फब्ती कस
लगाता जोरदार ठहाका
बताओ न कैसा लगता तुम्हे..?
कैसा लगता तुम्हें..?
................... निर्मला पुतुल

निर्मला की इस कविता पर बात कहाँ से शुरु करूँ समझ नहीं पा रही. सोच रही हूँ कि क्या इस तरह की कवितायें देश का प्रधान नहीं पढता ? सोच रही हूँ कि इस तरह की कवितायें देश का सेनाध्यक्ष नहीं पढता? और यह भी सोच रही हूँ कि क्या इस तरह की कविताओं पर देश की पुलिस की भी नज़र नहीं जाती? अगर नहीं जाती तो यह इस देश का दुर्भाग्य ही है क्योंकि अगर वह इस तरह के साहित्य से गुजरे होते इस तरह की चर्चाओं में उनके बयान की गम्भीरता कुछ और ही होती
मैने इस कविता को पहले कई बार पढा है और जब भी पहले इसे पढा तो सोचती रही कि निर्मला के सारे सवाल आखिर किससे हैं? क्या गैर आदिवासियों से ? या फिर सत्ता और उसके आस पास बैठे उनसे जो कल चर्चा का हिस्स थे ? किससे ?क्योंकि जब भी इस कविता को ध्यान से पढा है और समझने की कोशिश की है तो लगा है जैसे कि यह सवाल तो इस देश का अधिकांश नागरिक पूछ रहा है. जरा गौर से पढिये पुतुल को ............क्या यह सवाल उत्तर प्रदेश के उस गाँव के किसानों के नहीं हैं जिसके खेत का सरकार अधिग्रह्ण कर बिल्डर्स को देती है ? क्या यह सवाल सुदूर हिमांचल में रहने वाले लोगों के नहीं हैं? क्या यह सवाल गवाँर सम्मझे जाने वाले लोगों के नहीं हैं? क्या यह सवाल गरीब हरिजन के नहीं हैं ? हाँलाकि देखा जाये तो यह सभी सवाल पुतुल अपनी जमात की तरफ से कर रही हैं किंतु यह सवाल एक शास्वत सवाल है
अगर इस कविता के माध्यम से सिर्फ आदिवासी जमात की ही बात की जाये तो भी कविता कुछ मूल भूत व्यव्हारिक बात को हमारे सामने सरलता से लाती है. देखा जाये तो यह कविता एक ही देश में हो रहे नागरिकों के बीच की भयानक दूरी, कुंठा, क्षोभ और गहरे आक्रोश को व्यक्त करती है . आप इस कविता की निम्न पंक्तियों को पढे कई बातें और उसकी परतें साफ साफ खुलती जातीं हैं -
सोचो, कि कुछ देर के लिए ही सोचो, पर सोचो,
कि अगर किसी पंक्ति में तुम
सबसे पीछे होते
और मैं सबसे आगे और तो और
कैसा लगता, अगर तुम मेरी जगह काले होते
और चिपटी होती तुम्हारी नाक
पांवो में बिबॉई होती?
और इन सबके लिए कोई फब्ती कस
लगाता जोरदार ठहाका
बताओ न कैसा लगता तुम्हे..?
कैसा लगता तुम्हें..?

पर यहाँ मैं इस कविता को सिर्फ और सिर्फ आदिवासी जीवन, उसके सवाल और उसके आक्रोश से जोडकर ही देखने की कोशिश करूंगी ताकि हम आदिवासी सवाल से उसके आक्रोश और फिर नक्सल वाद तक के उनके सफर और साथ ही साथ दिल्ली दरबार , उसकी फितरत और वहा बैठे साझ्दारों की समझ के भी सफर की झलक देख सकने की कोशिश कर सकें...... यह इसलिये भी कि यह आलेख कल की चर्चा के आलोक में लिख रही हूँ

............... शेष अगले भाग मे^







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