Saturday, January 21, 2017

कहने सुनने के लमहों से निकल कर

एक कोना रीता ही रह गया है
सूना सूना
कहने सुनने के लमहों से निकल कर
एक अंधेरी कोठरी पकड ली है
सुकून की ठंढ के लिये

सालों जिद की थी
अपने उगने के लिये
सब सील गयी है
छट्पटाहट दम दोडकर
चुप है
कहीं कोने में दुबकी पडी

कलम और शब्द
सब कैद हैं
उस लोहे की आलमारी में
जिसे खोलने में अब हाथ सिहर जाते हैं
और उंगलियां टेढी हो
विफ़र उठती हैं

अजीब वक्त है,
बदला बदला
अजीब जगह है
दुश्मन सरीखी
जो सारे शौक, हुनर और पसंद को
तहखाने में डाल देने को
आमादा कर
सलीका बताती है
और मुंह पर जबरन उंगली रख
चुप हो जाने को
बेहतर चरित्र का लाबाद ओढा
मुस्कुराती है

अजीब लोग हैं
बडी बडी डिग्रियों के साथ
अनपढ
कलम से चिढे
शब्द से डरे
सारे अधिकारों कानूनों से
अनजान

इस गहरे अवसाद
उसके घात के बाद भी
मन अभी जिन्दा है
सोचता है,
स्थितियों पर विचार करता हुआ
टपक भी जाता है
कौन समझेगा कि
एक अंधेरा कमरा फ़िर
जीना चहता है
फ़िर से उगने के लिये


अल्का


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